प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी एक बार फिर उत्तराखंड की जनता को निराश कर गए:- राकेश राणा

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देहरादून में दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के अवसर पर लोगों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री प्रदेश की ज्वलंत समस्याओं पर बात करेंगे, लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी भाषण केवल चुनावी जुमलों और भावनात्मक मुद्दों तक सीमित रहा।
उत्तराखंड के बेरोजगार नौजवान रोजगार की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन उनके लिए कोई ठोस घोषणा नहीं की गई। वर्षों से न्याय की मांग कर रहे अंकिता भंडारी के परिवार को भी फिर निराशा ही हाथ लगी—इस संवेदनशील मुद्दे पर एक शब्द तक नहीं बोला गया।
प्रदेश में लगातार बढ़ती महंगाई, बिजली-पानी के बढ़ते बिल और आम आदमी पर पड़ते आर्थिक बोझ पर भी कोई स्पष्ट दृष्टिकोण सामने नहीं आया। जहां एक ओर उत्तराखंड को “डेस्टिनेशन वेडिंग हब” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बढ़ते अपराध, हत्याएं और कानून-व्यवस्था की गिरती स्थिति पर चुप्पी चिंता पैदा करती है।
देवभूमि उत्तराखंड, जो अपनी शांति और संस्कृति के लिए जानी जाती थी, आज भूमाफिया, खनन माफिया और आपराधिक तत्वों की गतिविधियों से प्रभावित होती नजर आ रही है। सवाल यह है कि आखिर इन सब पर सरकार की सख्ती कब दिखेगी?
देश और प्रदेश के लाखों युवा अग्निवीर योजना में बदलाव या पुरानी भर्ती प्रणाली की बहाली की उम्मीद कर रहे थे, वहीं कर्मचारी वर्ग पुरानी पेंशन योजना (OPS) को लेकर आशान्वित था—लेकिन इन दोनों ही महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी निराशाजनक रही।
पर्यटन को बढ़ावा देने की बात तो की जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत है। शहरी क्षेत्रों में होमस्टे पर मिलने वाली सब्सिडी समाप्त कर दी गई, ग्रामीण क्षेत्रों में इसे आधा कर दिया गया और नए टैक्स लगाकर परिवहन व होटल व्यवसाय पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया गया है। इससे स्थानीय रोजगार और अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
उत्तराखंड की जनता अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि ठोस नीतियां और जवाबदेही चाहती है।

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