दिव्य हिमगिरि रूबरू के इस अंक में हमारे साथ हैं पूर्व नौसेना अधिकारी उपेन्द्र अग्रवाल जो देहरादून में इनडोर केसर (लैब आधारित) की फार्मिंग कर रहे हैं। इंडियन नेवी से जैविक किसानी तक के उनके इस सफर के बारे में उनसे बात कर रहे हैं लोकेश राज अस्थाना
अपनी पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
मैं एक आध्यात्मिक और धार्मिक परिवार से हूँ। मेरे माता-पिता आर्य समाज के अनुयायी हैं जहाँ नैतिक व सामाजिक मूल्य सर्वोपरि हैं। मेरे परिवार की जड़ें हरियाणा में हैं लेकिन मेरे दादाजी ने व्यवसाय के लिए कलकत्ता में स्थानांतरित कर दिया। बड़े होते हुए मैंने देशभक्ति, निष्ठा और समुदाय में रहने की महत्वता सीखी। मेरे माता पिता ने सुनिश्चित किया कि हम अपनी सामाजिक, धार्मिक व घरेलू जिम्मेदारियाँ को समझे और साझा करें। हम आर्य समाज की सभाओं में जाते थे जहाँ हमने सम्मान, दया और समुदाय में रहने के मूल्यों को सीखा। हम विभिन्न गतिविधियों में भाग लेते है जैसे भोजन परोसना, सफाई करना, और बुजुर्गों की देखभाल करना। इसने हमें टीमवर्क, जिम्मेदारी और सामाजिक कौशल सिखाया। मैंने स्वच्छता और संगठन की आदत विकसित की जो मुझे नौसेना में काम आई। मैंने मार्शल आर्ट, योग और नौकायन सीखा है और वर्तमान में मैं कृषि और जैविक खेती के बारे में सीख रहा है। मैं निरंतर सीखने और अपने कौशल को बढ़ाने में विश्वास करता हूँ। मैंने भारतीय नौसेना में 27 वर्ष सेवा की जहाँ मैं विभिन्न बंदरगाहों पर तैनात रहा और कई कार्य किये। मैंने 2 युद्धपोत जहाजों की कमान भी संभाली। ये 27 साल मेरे लिए बहुत ही संतोषजनक रहे। मेरी पत्नी एक गृहिणी हैं और हमारे दो बेटे हैं। मेरा बड़ा बेटा आईआईटी धनबाद में है और मेरा छोटा बेटा ११वीं कक्षा में है। मैं अपने परिवार के मूल्यों और समर्थन के लिए उनका आभारी हूँ जिसने मेरे सफलता में योगदान दिया है। मैं एक ऐसे परिवार का हिस्सा होने पर गर्व महसूस करता हूँ जो परंपरा, समुदाय और व्यक्तिगत विकास को महत्व देता है।
वर्तमान में आप कॉरपोरेट में कार्यरत है और प्रगतिशील किसान के रूप में केसर की खेती भी कर रहे हैं। यह जय जवान जय किसान का एक आदर्श उदाहरण है। यह विचार मन में कैसे आया?
मैं कुवैत में एक कंपनी के लिए काम कर रहा हूँ जो युद्ध प्रभावित क्षेत्रों से भूमि विस्फोटक पदार्थों को साफ करती है। मैं हमेशा से समाज को बेहतर बनाने कि लिए कुछ करना चाहता था और शुद्ध व पौष्टिक खान-पान हमारे समाज की उन्नति के लिए बहुत जरुरी है। मेरे हिसाब से एक प्रगतिशील कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में खेती बहुत महत्वपूर्ण है। हम माँ भूदेवी की पूजा करते हैं और सभी रूपों में उर्वरता को महत्व देते हैं इसलिए मैंने कृषि में आने का फैसला किया। हम सभी की पता है कि आधुनिक खेती में बहुत सारे कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है इसलिए हमने जैविक रूप से स्वस्थ सब्जियों उगाने का फैसला किया। रक्षा और कॉर्पोरेट में मेरे अनुभव के साथ, हमें लगा कि पारंपरिक खेती को मॉडर्न टेक्नोलॉजी के साथ बेहतर बनाया जाना चाहिए। हम कृषि को देखने के तरीके को बदलना चाहते हैं। देहरादून में मैं जैविक खेती का प्रयास कर रहा हूँ, जिसमें केसर के साथ शिमला मिर्च, पत्ता गोभी, मूली, प्याज,
और जी जैसी सब्जिया उगाने की कोशिश कर रहा हूँ। अगर हम केसर कि बात करें तो केसर एक अत्यधिक मूल्यवान, बेहतर गुणवत्ता वाला मसाला है जिसमें अद्भुत स्वास्थ्य लाभ हैं। इसकी मांग बहुत अधिक है लेकिन आपूर्ति सीमित है मुख्य रूप से कश्मीर से। मुझे याद है कि बचपन में हमारी माँ खीर में और दूध में केसर डालती थी. मगर आज केसर बहुत कम घरों में पाया जाता है। मैं चाहता हूं कि पहले की भाति केसर हर घर में वापस आए। मेरे जैसे कई लोग इन-डोर केसर खेती के साथ प्रयोग कर रहे हैं और मुझे यकीन है कि हम अगले कुछ वर्षों में भारत में कंसर का उत्पादन बढ़ाएंगे। वैज्ञानिक तरीकों और नियंत्रित वातावरण के साथ हम पूरे देश में केसर का उत्पादन कर सकते हैं जिससे यह फिर से एक घरेलू मसाला बन जाएगा। अधिक लोग इसके औषधीय गुणों से लाभ उठाएंगे और स्वस्थ जीवन जीने में सक्षम होंगे।
अगर आप भारतीय नौसेना में ना गए होते तो क्या पूर्णकालिक खेती को अपना करियर चुनते?
जब मैं युवा था तब मैंने खेती को एक करियर के रूप में कभी नहीं सोचा था लेकिन आज शिक्षा और वित्तीय स्थिरता के साथ मैं खेती को अलग तरह से देखता हूँ। मेरे पास प्रयोग करने का समय है और यह एक शांतिपूर्ण, संतोषजनक गतिविधि बन गई है। शहर के शोर से दूर, भूमि पर काम करना शांतिदायक है। अपनी शिक्षा, अनुभव और आधुनिक तकनीक के साथ मैं भूमि का आर्थिक रूप से उपयोग कर रहा हूँ जिससे मेरे और मेरे साथ जुड़े लोगों के परिवार को लाभ होगा। अब मैने खेती को एक पूर्णकालिक करियर के रूप में देखना शुरू कर दिया है। सरकारी समर्थन, बैंकिंग और आधुनिक खेती के तरीकों के साथ मैं जैविक भोजन को व्यावसायिक रूप पर उगाने की दिशा में कार्य कर रहा हूँ।
आप देहरादून में लैब आधारित केसर उगा रहे हैं। इसकी खेती कैसे की जाती हैं, इसके बारे में विस्तार से बताएं।
हाँ, यह बिल्कुल सही है। हम अब देहरादून में केसर उगा रहे हैं। पारंपरिक रूप से केसर कश्मीर (जैसे पम्पोरे और किश्तवार क्षेत्रों) में उगाया जाता है। सरकार ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर राज्यों में इसे उगाने के प्रयोग किए हैं जिन पर अभी भी शोध चल रहा है। निजी व्यक्ति भी इनडोर प्रयोगशालाओं में केसर उगाने के प्रयोग कर रहे हैं जहाँ वे तापमान, प्रकाश और नमी को नियंत्रण में रखने कि लिए इंसुलेटेड चैंबर के प्रयोग कर रहे हैं जो कश्मीर के वातावरण की नकल करते हैं। ये प्रयोग वैश्विक स्तर पर सफल रहे हैं और भारत में भी इसकी प्रगति हो रही है। दूसरों के अनुभव से सीखते हुए हमने देहरादून में पिछले साल शुरुआत की और एक साइकिल पूरा कर चुके हैं। हम इस साल प्रक्रिया को दोहरा रहे हैं और बेहतर फसल की उम्मीद कर रहे हैं। अगले साल जब हमारी तीसरी फसल होगी हमें लगता है कि हम ब्रेक-इवन पर पहुँच जाएंगे और सर्वोत्तम मसाला प्रदान करेंगे। सीखने की यह प्रक्रिया बहुत कठिन नहीं है। थोड़ी लगन, मेहनत और पढाई से यह की जा सकती है। इसमें थोड़े वित्तीय निवेश की आवश्यकता भी है। अगर लोग चाहे तो अपने घर कि छत्त पर छोटे रूप में इसके शुरुआत कर सकते है। अधिक से अधिक लोगों के शामिल होने से हम उत्पादन बढ़ा सकते हैं और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुणवत्ता वाले केसर प्रदान कर सकते हैं।
केसर को लेकर भविष्य में आपकी क्या क्या योजनाएं हैं?
अगले साल 2027 के अंत तक हमें केसर उगाने के विषय पर काफी अनुभव और ज्ञान हो जाएगा और उम्मीद है हम पर्याप्त लाभ भी कमाएंगे। कोशिश करेंगे कि हम केसर के उत्पादन को बढ़ाते रहे। हम लोगों को उनकी अपनी प्रयोगशालाएं स्थापित करने में मदद करना वाहते है। हम उन्हें प्रशिक्षित करेंगे, अपने ज्ञान को साझा करेंगे और उन्हें निवेश करने और गलतियों से बचने के तरीके सिखाएंगे। हम उन्हें फसल प्राप्त करने, अपने उत्पादों का विपणन करने और धन बनाने में मदद करेंगे, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार होगा। केसर बहुत श्रम-गहन नहीं है। श्रम की आवश्यकता केवल 2-3 बार होती है। इसे भूमि और स्थान की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती है और उत्तराखंड में उपयुक्त तापमान है। न्यूनतम तकनीक के साथ हम रोजगार पैदा कर सकते हैं। उत्तराखंड और अन्य पहाड़ी राज्यों में समृद्धि और स्वास्थ्य ला सकते हैं। लोग केसर उगाने में अपना समय, ऊर्जा और रुचि लगा सकते हैं जिससे क्षेत्र को लाभ होगा।






