देवभूमि की राजधानी देहरादून इन दिनों ऐसी घटनाओं का गवाह बन रही है, जिन्होंने कानून व्यवस्था की बुनियाद को हिला कर रख दिया है। महज 16 दिनों के भीतर पांच हत्याएं यह संकेत दे रही हैं कि अपराधियों के हौसले किस स्तर तक पहुंच चुके हैं। शहर के बीचोंबीच गोलियां चल रही हैं, गला रेतकर हत्या हो रही है और वारदात के बाद हमलावर आसानी से निकल जा रहे हैं। 29 जनवरी को विकासनगर में 18 वर्षीय छात्रा की हत्या से शुरू हुआ यह सिलसिला 31 जनवरी को ऋषिकेश में घर में घुसकर गोली मारने की घटना, 2 फरवरी को पलटन बाजार में दिनदहाड़े युवती की निर्मम हत्या, 11 फरवरी को तिब्बती मार्केट में 40 वर्षीय व्यक्ति की गोली मारकर हत्या और 13 फरवरी को सिल्वर सिटी मॉल के पास सरेआम फायरिंग तक जा पहुंचा। राजधानी के प्रमुख और व्यस्त इलाकों में इस तरह की घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर सुरक्षा तंत्र की पकड़ कहां ढीली पड़ रही है।
सबसे गंभीर प्रश्न पुलिस की सतर्कता और गश्त व्यवस्था को लेकर उठ रहे हैं। क्या खुफिया इनपुट विफल हो रहे हैं? क्या अपराधियों में कानून का भय समाप्त हो चुका है? जब बाजारों में दिनदहाड़े हत्या हो और हमलावर खुलेआम चुनौती देकर निकल जाएं, तो यह केवल एक आपराधिक वारदात नहीं रहती, बल्कि यह कानून के इकबाल पर सीधा प्रहार बन जाती है। लगातार हो रही इन घटनाओं ने धामी सरकार की साख पर भी असर डाला है। विपक्ष हमलावर है, व्यापारिक वर्ग बेचैन है और आम लोग सुरक्षा को लेकर असमंजस में हैं। देहरादून आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां निर्णायक और कठोर कार्रवाई की अपेक्षा बढ़ गई है। 16 दिनों में पांच हत्याएं केवल आंकड़ा नहीं हैं, यह चेतावनी है कि यदि अपराध पर प्रभावी अंकुश नहीं लगाया गया तो राजधानी की पहचान और सरकार की विश्वसनीयता, दोनों पर गहरा असर पड़ सकता है। शंभू नाथ गौतम, वरिष्ठ पत्रकार
अभी कुछ समय पहले की ही बात है जब कोई भी व्यक्ति राजधानी देहरादून में आता था तब वह अपने घरवालों और सगे संबंधियों को बताया करता था कि “मैं दून में हूं और सुकून में हूं।” यह सच है कि देहरादून सुकून के लिए पूरे देश भर में जाना जाता है । लेकिन हाल के वर्षों में राजधानी देहरादून के बिगड़ते हालात भयावह संदेश दे रहे हैं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, वह शहर जिसे कभी शांत, सुरक्षित और सुसंस्कृत कहा जाता था, आज अपराधियों की शरणस्थली, सरेबाजार गोलियों की तड़तड़ाहट, दिनदहाड़े मर्डर होना अब आम बात होती जा रही है। राजधानी देहरादून में अब लोगों को डर लगने लगा है, पता नहीं कब, कहां से गोली चल जाए। राजधानी देहरादून में क्या आम और क्या खास सभी डर के साए में है। सवाल पुलिस पर भी उठ रहे हैं। देवभूमि की राजधानी देहरादून आज एक भारी, चुभते हुए सन्नाटे में खड़ी है। यह सामान्य खामोशी नहीं है । यह उन गोलियों की गूंज के बाद पसरा हुआ विराम है, जो भीड़भाड़ वाले बाजारों में चलीं। यह उन अचानक थम गई आवाजों की खामोशी है, जो दिनदहाड़े अफरा-तफरी में बदल गईं। और सबसे बढ़कर, यह उस भरोसे में आई दरार की आहट है, जो जनता ने कानून और व्यवस्था पर वर्षों से टिका रखी थी।
महज 16 दिनों के भीतर पांच हत्याएं। पांच जिंदगियां, पांच परिवार, पांच अलग-अलग घटनास्थल। लेकिन एक ही सवाल। क्या देहरादून में ‘रूल ऑफ लॉ’ वास्तव में ढेर हो चुका है? 29 जनवरी को विकासनगर में 18 वर्षीय छात्रा मनीषा तोमर की हत्या ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। बारहवीं कक्षा की छात्रा, जिसे उसका ही चचेरा भाई दवा दिलाने के बहाने घर से ले गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई। यह केवल एक जघन्य अपराध नहीं था, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक विश्वास पर भी चोट थी। उस दिन लोगों ने इसे एक अलग-थलग घटना मान लिया। लेकिन यह तो आने वाले भयावह सिलसिले की शुरुआत भर थी। 31 जनवरी को ऋषिकेश में एक महिला की घर में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमलावर वारदात को अंजाम देकर फरार हो गया। निजी संबंधों के विवाद से जुड़ा यह मामला भी कानून-व्यवस्था की दृष्टि से कम गंभीर नहीं था। सवाल उठा—घर के भीतर तक पहुंचकर हत्या करने का दुस्साहस आखिर अपराधियों को कहां से मिल रहा है? 2 फरवरी को देहरादून के दिल पलटन बाजार में 23 वर्षीय युवती गुंजन की गला रेतकर दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। यह घटना केवल एक अपराध नहीं थी, यह राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था के लिए खुली चुनौती थी। भीड़भाड़ वाले बाजार में, जहां सैकड़ों लोग मौजूद रहते हैं, वहां इस तरह की निर्मम हत्या ने व्यापारियों और आम नागरिकों को झकझोर दिया। बाजार बंद हुए, विरोध हुआ, और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल उठे। 11 फरवरी को तिब्बती मार्केट में 40 वर्षीय अर्जुन शर्मा को गोली मार दी गई। बाजार क्षेत्र, आम आवाजाही, और उसके बीच गोलियां चलना, यह किसी फिल्मी दृश्य जैसा प्रतीत होता है, लेकिन यह देहरादून की हकीकत थी। अपराधी आए, गोली चलाई और निकल गए। क्या उन्हें पकड़ने का भय नहीं था? क्या निगरानी तंत्र इतना कमजोर पड़ चुका है?
और फिर 13 फरवरी को देहरादून के सिल्वर सिटी मॉल के पास कुख्यात विक्रम शर्मा की सरेआम गोली मारकर हत्या। यह घटना अपराध की दुनिया से जुड़े व्यक्ति की थी, लेकिन स्थान और तरीका फिर वही खुलेआम फायरिंग। यह संदेश साफ था कि अपराधी अब छिपकर नहीं, बल्कि सामने आकर वारदात कर रहे हैं। इन पांच घटनाओं को यदि अलग-अलग देखें तो हर मामले की अपनी पृष्ठभूमि है। लेकिन यदि इन्हें एक क्रम में जोड़ें तो तस्वीर बेहद चिंताजनक नजर आती है। राजधानी के अलग-अलग हिस्सों, विकासनगर, ऋषिकेश, पलटन बाजार, तिब्बती मार्केट, सिल्वर सिटी मॉल में हुई हत्याएं बताती हैं कि अपराध किसी एक इलाके तक सीमित नहीं रहा। सबसे बड़ा प्रश्न पुलिस की भूमिका पर उठ रहा है। क्या गश्त व्यवस्था प्रभावी है? क्या खुफिया इनपुट समय पर मिल रहे हैं? क्या संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी पर्याप्त है? जब बाजारों में, मॉल के पास और घरों के भीतर तक अपराधी पहुंच जा रहे हैं, तो यह केवल संयोग नहीं हो सकता। यह सुरक्षा तंत्र की कमजोरी की ओर इशारा करता है। राजधानी में कानून का इकबाल तभी कायम रहता है जब अपराधी वारदात से पहले डरें। लेकिन यहां तस्वीर उलट दिखाई दे रही है। अपराधियों का दुस्साहस बढ़ता नजर आ रहा है। वारदात के बाद उनका तेजी से फरार हो जाना पुलिस की प्रतिक्रिया समय और रणनीति पर सवाल खड़ा करता है। इन घटनाओं का राजनीतिक असर भी कम नहीं है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार लगातार कानून व्यवस्था को मजबूत रखने के दावे करती रही है। लेकिन राजधानी में 16 दिनों में पांच हत्याएं उन दावों की कसौटी बन गई हैं। विपक्ष ने इसे सरकार की विफलता करार दिया है, जबकि आम जनता के बीच भी चर्चा है कि आखिर सुरक्षा व्यवस्था में ऐसी कौन-सी चूक है, जो लगातार सामने आ रही है। देहरादून की पहचान लंबे समय तक एक शैक्षणिक और शांत शहर की रही है। यहां देशभर से छात्र पढ़ने आते हैं, परिवार सुरक्षित भविष्य की उम्मीद लेकर बसते हैं। लेकिन हालिया घटनाओं ने उस छवि को धूमिल किया है। व्यापारिक संगठनों की नाराजगी, बाजार बंद करने के निर्णय और नागरिकों की बेचैनी संकेत दे रही है कि भरोसा कमजोर हो रहा है। कानून-व्यवस्था केवल अपराध दर्ज करने और आरोपियों को पकड़ने तक सीमित नहीं होती। यह एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी है, एक ऐसा भरोसा कि राज्य आपके साथ खड़ा है और अपराधी कानून से बच नहीं सकते। जब कम समय में बार-बार हत्याएं होती हैं, तो यह भरोसा दरकने लगता है। अब चुनौती केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। चुनौती है उस व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने की, जिससे अपराधी वारदात से पहले सौ बार सोचें। चुनौती है पुलिस तंत्र को सक्रिय, सतर्क और प्रभावी बनाने की। और चुनौती है सरकार के लिए अपनी साख को बचाने की, क्योंकि राजधानी की कानून-व्यवस्था पूरे प्रदेश की छवि तय करती है। 16 दिनों में पांच हत्याएं, यह आंकड़ा मात्र संख्या नहीं है। यह एक चेतावनी है। यदि इसे गंभीरता से नहीं लिया गया, यदि पुलिस व्यवस्था में तत्काल सुधार और कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो देहरादून की पहचान पर लगा यह दाग और गहरा हो सकता है। राजधानी देहरादून आज एक निर्णायक मोड़ पर है। यहां से या तो कानून का इकबाल फिर से स्थापित होगा, या फिर अपराधियों का मनोबल और बढ़ेगा। आने वाले दिन तय करेंगे कि देहरादून अपनी पुरानी साख लौटाता है या ‘रूल ऑफ लॉ’ की बहाली के लिए और बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
अर्जुन हत्याकांड का खुलासा, 12 लाख की सुपारी, सगे भाई शूटर, मां बीना शर्मा समेत पांच गिरफ्तार
देहरादून की तिब्बती मार्केट में 11 फरवरी की सुबह हुई अर्जुन शर्मा की सनसनीखेज हत्या का पुलिस ने बड़ा खुलासा किया है। जांच में सामने आया है कि हत्या की साजिश संपत्ति विवाद को लेकर रची गई थी और 12 लाख रुपये में सुपारी देकर वारदात को अंजाम दिलाया गया। घटना को अंजाम देने वाले दोनों शूटर सगे भाई हैं, जबकि साजिश में मृतक की मां बीना शर्मा समेत कुल पांच लोगों की भूमिका पाई गई है। पुलिस मुठभेड़ में घायल दोनों मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि अन्य तीन आरोपियों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। 11 फरवरी को सुबह करीब 10:30 बजे कोतवाली डालनवाला पुलिस को सूचना मिली कि तिब्बती मार्केट के पास स्कूटी सवार दो बदमाशों ने एक व्यक्ति को गोली मार दी है। पुलिस तत्काल मौके पर पहुंची और घायल को दून अस्पताल भिजवाया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मृतक की पहचान इंदिरा नगर निवासी अर्जुन शर्मा के रूप में हुई, जो जीएमएस रोड स्थित अमरदीप गैस एजेंसी के स्वामी थे।
घटना की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय सिंह के निर्देश पर अलग-अलग टीमें गठित की गईं। शहर और देहात क्षेत्रों में नाकेबंदी कर सघन चेकिंग अभियान चलाया गया। सीसीटीवी फुटेज खंगालने पर दो स्कूटी सवार हमलावरों की पहचान सामने आई। चेकिंग के दौरान 11-12 फरवरी की रात रायपुर थाना क्षेत्र के लाडपुर इलाके में एक संदिग्ध को रोकने का प्रयास किया गया। उसने पुलिस पर फायरिंग कर जंगल की ओर भागने की कोशिश की। जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी। उसके कब्जे से 315 बोर का तमंचा और खोखा कारतूस बरामद हुआ। उसने अपना नाम राजीव उर्फ राजू बताया। इसी रात डोईवाला के लालतप्पड़ क्षेत्र में बैरियर पर एक अन्य स्कूटी सवार ने पुलिस को देखकर भागने का प्रयास किया और बिरला फैक्ट्री परिसर में घुसकर फायरिंग की। जवाबी कार्रवाई में वह भी पैर में गोली लगने से घायल हुआ। उसकी पहचान पंकज राणा के रूप में हुई। दोनों ने पूछताछ में अर्जुन शर्मा की हत्या स्वीकार की। दोनों आरोपी सगे भाई हैं और मूल रूप से ग्राम देवीखाल, गुमखाल, कोटद्वार (जिला पौड़ी गढ़वाल) के निवासी हैं। वर्तमान में वे चक्खुवाला, देहरादून में रह रहे थे। पुलिस ने उनके पास से दो तमंचे 315 बोर, जिंदा व खोखा कारतूस तथा घटना में प्रयुक्त स्कूटी बरामद की है। पुलिस टीम पर जानलेवा हमले के मामले में उनके खिलाफ संबंधित धाराओं में अलग से मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
संपत्ति विवाद बना अर्जुन शर्मा की हत्या की वजह
पुलिस जांच में सामने आया कि अर्जुन शर्मा का अपनी मां बीना शर्मा और उनके सहयोगियों के साथ संपत्ति और पैसों के लेन-देन को लेकर गंभीर विवाद चल रहा था। जीएमएस रोड स्थित एक संपत्ति की करीब 14 करोड़ रुपये में डील डॉ. अजय खन्ना के साथ हुई थी, जिसमें से लगभग 8 करोड़ रुपये बीना शर्मा को दिए जा चुके थे। लेकिन अर्जुन शर्मा ने उक्त संपत्ति के विक्रय पर न्यायालय से स्थगन आदेश ले लिया था, जिसके चलते डील अटक गई थी। इसी विवाद को लेकर मां-बेटे के बीच तनाव बढ़ गया था। जांच में यह भी सामने आया कि बीना शर्मा ने घटना से कुछ दिन पहले अर्जुन की दिनचर्या के बारे में जानकारी जुटवाई थी। पुलिस के अनुसार, डॉ. अजय खन्ना, विनोद उनियाल और बीना शर्मा ने मिलकर अर्जुन को रास्ते से हटाने की साजिश रची और 12 लाख रुपये में सुपारी तय की गई। तीन लाख रुपये अग्रिम दिए गए थे, शेष रकम वारदात के बाद दी जानी थी। पुलिस को यह भी जानकारी मिली कि वारदात से पहले और बाद में पंकज राणा की व्हाट्सएप के माध्यम से विनोद उनियाल से बातचीत हुई थी और घटना के बाद वह उसके घर भी गया था। साजिश में शामिल पाए जाने पर पुलिस ने बीना शर्मा, विनोद उनियाल और डॉ. अजय खन्ना को भी गिरफ्तार कर लिया है। सभी आरोपियों से पूछताछ जारी है। मुख्य शूटर पंकज राणा और राजीव उर्फ राजू को न्यायालय में पेश कर रिमांड पर लिया गया है। पुलिस ने 2 तमंचे जिंदा और खोखा कारतूस और घटना में प्रयुक्त स्कूटी बरामद की है।
देहरादून के सिल्वर सिटी मॉल में दिनदहाड़े कुख्यात विक्रम शर्मा की हत्या
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून एक बार फिर गोलियों की आवाज से दहल उठी। शहर के व्यस्त सिल्वर सिटी मॉल में शुक्रवार सुबह हुए सनसनीखेज शूटआउट ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए, बल्कि यह भी उजागर कर दिया कि बाहरी राज्यों के कुख्यात अपराधी किस तरह दून में गुमनाम जिंदगी बिता रहे हैं।
मृतक की पहचान झारखंड के जमशेदपुर निवासी विक्रम शर्मा के रूप में हुई है, जो आपराधिक जगत का बड़ा नाम माना जाता था। वह झारखंड की दुमका जेल में बंद कुख्यात माफिया डॉन अखिलेश सिंह का आपराधिक गुरु बताया जाता है। पुलिस के अनुसार घटना सुबह करीब 10 बजे की है। विक्रम शर्मा सिल्वर सिटी मॉल स्थित जिम से वर्कआउट कर बाहर निकल रहा था। जैसे ही वह सीढ़ियों के पास पहुंचा, पहले से घात लगाए दो हमलावर पैदल पहुंचे और नजदीक से पिस्टल से ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। तीन गोलियां लगने से उसकी मौके पर ही मौत हो गई। वारदात के बाद हमलावर फरार हो गए। मॉल परिसर और आसपास के इलाके में अफरा-तफरी मच गई। सूचना मिलते ही पुलिस और फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू की। सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि विक्रम शर्मा पिछले करीब दस वर्षों से देहरादून की एक पॉश कॉलोनी में परिवार के साथ रह रहा था। स्थानीय स्तर पर उसकी पहचान एक कारोबारी, खासकर ट्रांसपोर्ट व्यवसायी के रूप में थी। उसके आपराधिक अतीत की जानकारी बहुत कम लोगों को थी। बताया जाता है कि उसके पिता टाटा स्टील में नौकरी करते थे और रिटायरमेंट के बाद देहरादून में बस गए थे। विक्रम का छोटा भाई अरविंद भी दून में ही रहता है।
विक्रम शर्मा का लंबा आपराधिक इतिहास
विक्रम शर्मा पर झारखंड के जमशेदपुर में 20 से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे हैं। हालांकि कई मामलों में वह बरी भी हो चुका था। वर्ष 2017 में जमशेदपुर पुलिस ने उसे देहरादून से गिरफ्तार किया था।वह 2017 से 2021 तक जेल में रहा और 30 जनवरी 2021 को रांची के होटवार जेल से सशर्त जमानत पर रिहा हुआ। 2008 में टाटा स्टील के सिक्योरिटी हेड जयराम सिंह की हत्या, श्रीलेदर्स के मालिक आशीष डे हत्याकांड, साकची के काशीडीह निवासी रवि चौरसिया पर फायरिंग, बर्मामाइंस में फायरिंग और परमजीत सिंह हत्याकांड समेत कई संगीन मामलों में उसका नाम सामने आया था। यह पहला मामला नहीं है जब किसी बाहरी राज्य के कुख्यात अपराधी की मौजूदगी दून में सामने आई हो। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और झारखंड के कई हिस्ट्रीशीटर पूर्व में देहरादून में किराये के मकानों या होटलों में छिपे पाए गए हैं। प्रॉपर्टी निवेश, होटल व्यवसाय या छोटे कारोबार की आड़ में कई अपराधी यहां वर्षों तक टिके रहे। गैंगवार या ठेकेदारी विवाद के बाद भी कई बदमाश दून का रुख करते रहे हैं। विक्रम शर्मा हत्याकांड के बाद किरायेदार सत्यापन, होटल रिकॉर्ड और राज्यों के आपराधिक डाटाबेस के समन्वय को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। क्या स्थानीय तंत्र को उनकी मौजूदगी की जानकारी नहीं होती, या फर्जी पहचान और शांत जीवनशैली की आड़ में वे आसानी से व्यवस्था को चकमा दे देते हैं? पुलिस का दावा और चुनौती देहरादून पुलिस का कहना है कि समय-समय पर बाहरी अपराधियों के खिलाफ अभियान चलाए जाते हैं और कई वांछित बदमाशों को गिरफ्तार कर संबंधित राज्यों को सौंपा गया है। लेकिन सिल्वर सिटी मॉल जैसी व्यस्त जगह पर दिनदहाड़े हुई यह हत्या संकेत दे रही है कि निगरानी तंत्र को और सशक्त करने की जरूरत है।
कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल, सरकार तुरंत करे उच्चस्तरीय समीक्षा: यशपाल आर्य
राजधानी देहरादून में लगातार हो रही हत्याओं ने कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विगत 15 दिनों के भीतर पांच हत्याओं की घटनाओं को नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने बेहद गंभीर बताया है। उन्होंने कहा कि यह कोई सामान्य आंकड़ा नहीं, बल्कि प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। यशपाल आर्य ने कहा कि जब प्रदेश की राजधानी ही असुरक्षित नजर आए, तो आम जनता की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? उनके अनुसार राज्य में अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और शासन-प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ प्रतीत होता है। आर्य ने कहा कि हत्या जैसी जघन्य घटनाओं का लगातार सामने आना कई गंभीर संकेत देता है। उनके मुताबिक या तो पुलिस तंत्र पर अत्यधिक दबाव है या कार्यप्रणाली में ढिलाई है। साथ ही अपराधियों में कानून का भय कम होता दिखाई दे रहा है और खुफिया तथा निगरानी व्यवस्था भी कमजोर पड़ी है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि राजधानी में 15 दिन में 5 हत्याएं होना किसी भी सरकार के लिए चेतावनी है। यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि हर परिवार की सुरक्षा और विश्वास से जुड़ा सवाल है।
धामी सरकार का एक्शन मोड, एसएसपी समेत कई जिलों में बड़ा पुलिस फेरबदल
देहरादून की सड़कों पर बीते दिनों बहा खून सिर्फ अपराध की वारदात नहीं था, वह कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल भी था। सोलह दिनों के भीतर पांच हत्याओं ने राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया। जनता के मन में उठते सवालों और बढ़ते दबाव के बीच सरकार ने आखिरकार सख्त संदेश देने का फैसला कर लिया। शुक्रवार को सत्ता के गलियारों से जो आदेश निकला, उसने पूरे पुलिस महकमे में हलचल मचा दी। यह सिर्फ तबादला सूची नहीं थी, बल्कि साफ संकेत था कि लापरवाही या ढिलाई अब बर्दाश्त नहीं होगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने एक झटके में कई अहम जिलों की कमान बदल दी। राजधानी देहरादून से लेकर कुमाऊं और गढ़वाल के जिलों तक पुलिस नेतृत्व में व्यापक फेरबदल कर दिया गया। सबसे बड़ा फैसला देहरादून के एसएसपी को हटाने का रहा, जो हालिया घटनाओं के बाद चर्चा के केंद्र में थे। सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि कानून-व्यवस्था से जुड़ा कोई भी संकेत हल्के में नहीं लिया जाएगा। पुलिस महकमे के भीतर भी यह संदेश गया है कि परिणाम आधारित काम ही अब पैमाना होगा। राजधानी की कमान बदली, तो हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे संवेदनशील जिलों में भी नए चेहरे तैनात कर दिए गए। एसटीएफ, अभिसूचना, एसडीआरएफ और पीएसी तक में जिम्मेदारियां पुनर्गठित की गईं। यह फेरबदल प्रशासनिक औपचारिकता से कहीं ज्यादा, रणनीतिक पुनर्संरचना के तौर पर देखा जा रहा है।
सरकार की मंशा साफ है, अपराध पर नकेल, व्यवस्था में अनुशासन और जवाबदेही तय। देहरादून में हालिया घटनाओं के बाद एसएसपी अजय सिंह को हटाकर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अजय सिंह पहले भी एसटीएफ की कमान संभाल चुके हैं। हरिद्वार के एसएसपी प्रमेंद्र सिंह डोभाल को देहरादून का नया एसएसपी बनाया गया है। वहीं, अब तक एसटीएफ एसएसपी रहे नवनीत सिंह भुल्लर को हरिद्वार का कप्तान नियुक्त किया गया है। एसडीआरएफ की डीआईजी निवेदिता कुकरेती को आईजी एसडीआरएफ बनाया गया है। एसपी सतर्कता मुख्यालय प्रहलाद नारायण मीणा को पुलिस उपमहानिरीक्षक सतर्कता मुख्यालय के पद पर तैनाती दी गई है। 31वीं वाहिनी पीएसी के सेनानायक यशवंत सिंह को पीटीसी नरेंद्र नगर का प्रधानाचार्य बनाया गया है। एसपी चंपावत अजय गणपति कुमार को ऊधमसिंह नगर का एसपी बनाया गया है। ऊधमसिंह नगर के कप्तान मणिकांत मिश्र को एसपी अभिसूचना नियुक्त किया गया है, जबकि एसपी अभिसूचना प्रदीप कुमार राय को सीबीसीआईडी का एसपी बनाया गया है। अभिसूचना में एसपी (क्षेत्रीय) की जिम्मेदारी संभाल रहे अमित श्रीवास्तव को सेनानायक आईआरबी प्रथम रामनगर भेजा गया है। एसपी रुद्रप्रयाग अक्षय प्रह्लाद कौंडे को पिथौरागढ़ का एसपी नियुक्त किया गया है। पिथौरागढ़ की एसपी रेखा यादव को चंपावत का पुलिस अधीक्षक बनाया गया है। बागेश्वर के पुलिस अधीक्षक चंद्रशेखर आर. घोड़के को अल्मोड़ा का एसपी नियुक्त किया गया है, जबकि अल्मोड़ा के एसपी देवेंद्र पिंचा को 31वीं वाहिनी पीएसी रुद्रपुर का सेनानायक बनाया गया है। एसपी अपराध एवं यातायात ऊधमसिंह नगर निहारिका तोमर को रुद्रप्रयाग का पुलिस अधीक्षक नियुक्त किया गया है। एसपी अपराध एवं यातायात हरिद्वार जितेंद्र कुमार मेहरा को एसपी बागेश्वर की जिम्मेदारी दी गई है। हरिद्वार एसपी जितेंद्र चौधरी को अपराध एवं यातायात ऊधमसिंह नगर का एसपी बनाया गया है। हरिद्वार एसपी निशा यादव को पुलिस अधीक्षक अपराध एवं यातायात हरिद्वार की जिम्मेदारी सौंपी गई है। एएसपी सीआईडी मनोज ठाकुर को एसपी कोटद्वार नियुक्त किया गया है। एसपी कोटद्वार पौड़ी गढ़वाल चंद्र सिंह को पुलिस अधीक्षक क्षेत्रीय अभिसूचना की जिम्मेदारी दी गई है। राज्य में हुए इस व्यापक फेरबदल को कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में बड़ा प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नए नियुक्त अधिकारी अपने-अपने जिलों में किस तरह से अपराध पर नियंत्रण और पुलिसिंग की साख को मजबूत करते हैं।






