लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी लोकतंत्र के लिये एक चिन्ताजनक घटना है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक प्रणाली नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, असहमति के सम्मान और संस्थागत विश्वास पर टिकी हुई एक जीवंत परंपरा है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में संसद इस लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, जहाँ न केवल नीतियाँ बनती हैं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा बोलती है। ऐसे में जब लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी की खबरें सामने आती हैं, तो यह घटना किसी एक व्यक्ति या दल तक सीमित न रहकर पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देती है। विपक्षी दलों द्वारा यह आरोप लगाया जाना कि उन्हें, विशेषकर नेता प्रतिपक्ष को, सदन में बोलने का समुचित अवसर नहीं मिल रहा, और इसी आधार पर अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठाना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह चिंता इसलिए भी अधिक गंभीर हो जाती है क्योंकि अध्यक्ष का पद परंपरागत रूप से सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन का प्रतीक माना जाता रहा है।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका केवल कार्यवाही संचालित करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह सदन की गरिमा, लोकतांत्रिक मर्यादा और सभी पक्षों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी भी निभाते हैं। यदि विपक्ष का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करने लगे कि अध्यक्ष का व्यवहार पक्षपातपूर्ण है या उनकी आवाज को व्यवस्थित रूप से दबाया जा रहा है, तो यह केवल राजनीतिक असंतोष नहीं, बल्कि संस्थागत अविश्वास का संकेत होता है। 100 से अधिक सांसदों द्वारा हस्ताक्षर कर अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी यह दर्शाती है कि मामला क्षणिक आक्रोश का नहीं, बल्कि लंबे समय से पनप रही असहमति और संवादहीनता का परिणाम है। लोकसभा अध्यक्ष सदन के संरक्षक की भूमिका में होते हैं, जिनके प्रति विश्वास जरूरी होता है और उनसे भी निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है। हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि संख्या बल के आधार पर इस तरह का प्रस्ताव पारित होना कठिन है, लेकिन लोकतंत्र में कई बार प्रतीकात्मक कदम भी गहरे संदेश देते हैं।
विपक्षी दलों द्वारा यह स्पष्ट करना कि वे टकराव के साथ-साथ सुलह का विकल्प भी खुला रखे हुए हैं, और इसी क्रम में विभिन्न वरिष्ठ नेताओं का अध्यक्ष से मुलाकात कर संवाद का प्रयास करना, इस बात का संकेत है कि अभी भी समाधान की गुंजाइश समाप्त नहीं हुई है। यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर संसद जैसे सर्वोच्च मंच पर संवाद की जगह हंगामा, नारेबाजी और गतिरोध क्यों हावी होता जा रहा है। क्या यह केवल सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच अविश्वास का परिणाम है, या फिर संसदीय परंपराओं के क्षरण का संकेत? विगत वर्षों में बार-बार यह देखने को मिला है कि महत्वपूर्ण विधेयकों और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर गंभीर चर्चा के बजाय सदन की कार्यवाही बाधित होती रही है। इससे न केवल विधायी कामकाज प्रभावित होता है, बल्कि जनता के बीच यह संदेश भी जाता है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति गंभीर नहीं हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह असहमति को स्थान देता है। विपक्ष का काम केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह ठहराना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना भी है। इसके लिए सदन में बोलने का अवसर, प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता और आलोचना का सम्मान अनिवार्य है। यदि विपक्ष यह महसूस करता है कि उसके लिए ये रास्ते संकुचित किए जा रहे हैं, तो उसका आक्रोश सड़कों या नारेबाजी के रूप में फूट पड़ता है, जो अंततः संसद की गरिमा को ही नुकसान पहुँचाता है। दूसरी ओर, विपक्ष द्वारा बार-बार सदन की कार्यवाही बाधित करना भी उतना ही गंभीर दोष है, क्योंकि इससे शासन की प्रक्रिया ठप होती है और जनता के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। इस दोतरफा अविश्वास और आक्रामकता के बीच लोकतंत्र का मूल उद्देश्य कहीं खोता हुआ दिखता है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यदि संसद बार-बार हंगामे, निलंबन और गतिरोध की खबरों में रहे, तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की लोकतांत्रिक छवि को प्रभावित करता है। विकास, नीति और जनकल्याण की चर्चा के स्थान पर यदि टकराव और अविश्वास केंद्र में आ जाए, तो यह भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। लोकतंत्र की मजबूती केवल मजबूत सरकार से नहीं, बल्कि मजबूत विपक्ष और निष्पक्ष संस्थानों से भी आती है। लोकसभा अध्यक्ष जैसे पद से अपेक्षा की जाती है कि वह न केवल नियमों का पालन कराए, बल्कि विश्वास का सेतु भी बने। वहीं विपक्ष से भी यह अपेक्षा है कि वह विरोध को रचनात्मक बनाए, न कि अवरोध का माध्यम।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद को फिर से संवाद का मंच बनाया जाए, जहाँ तीखी असहमति भी मर्यादा में व्यक्त हो और सत्ता व विपक्ष दोनों ही लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराएँ। अविश्वास प्रस्ताव जैसे कदम यदि चेतावनी के रूप में लिए जा रहे हैं, तो उन्हें आत्ममंथन का अवसर भी बनना चाहिए। प्रश्न यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह है कि लोकतंत्र की संस्था को कैसे स्वस्थ, विश्वसनीय और प्रभावी बनाया जाए। जनता ने सांसदों को नारे लगाने या कार्यवाही बाधित करने के लिए नहीं, बल्कि देश के भविष्य पर गंभीर विमर्श के लिए चुना है। यदि संसद इस अपेक्षा पर खरी नहीं उतरती, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है।
यह भी तथ्य है कि लोकसभा अध्यक्ष के रूप में श्री ओम बिरला का संसदीय संचालन अब तक सामान्यतः अनुशासित, कार्यकुशल और नियमसम्मत माना जाता रहा है। उनके कार्यकाल में लोकसभा की कार्यवाही को समयबद्ध ढंग से आगे बढ़ाने, विधायी कार्यों को प्राथमिकता देने और विभिन्न दलों को साथ लेकर चलने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अनेक अवसरों पर उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है तथा संसदीय परंपराओं और नियमों के पालन पर बल दिया है। उनकी छवि एक ऐसे अध्यक्ष की रही है जो सदन को सुचारु रूप से चलाने के लिए होशियारी, धैर्य और व्यावहारिक समझ का प्रयोग करते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, संसदीय मर्यादाओं का आग्रह और संवाद के लिए दरवाज़े खुले रखने की प्रवृत्ति को देखते हुए उनके जैसे लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की स्थिति अपने आप में एक त्रासद और चिंताजनक घटना प्रतीत होती है। यह घटना व्यक्ति विशेष से अधिक उस माहौल की ओर संकेत करती है, जहाँ अविश्वास इतना गहरा हो चुका है कि संवाद और विश्वास के पुल कमजोर पड़ते जा रहे हैं।
अंततः यह समय आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर जिम्मेदारी स्वीकार करने का है। सत्तापक्ष को यह समझना होगा कि मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है। विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि विरोध की भी एक मर्यादा और रचनात्मकता होती है। और अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पदों को यह स्मरण रखना होगा कि उनकी निष्पक्षता केवल नियमों के पालन से नहीं, बल्कि व्यवहार और अवसर की समानता से भी सिद्ध होती है। यदि संसद को संवाद का मंच बनाए रखने में हम विफल रहते हैं, तो यह केवल एक सत्र या एक सरकार की विफलता नहीं होगी, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति हमारी सामूहिक असफलता मानी जाएगी। यही वह बिंदु है जहाँ हर नागरिक, हर जनप्रतिनिधि और हर संस्था को आत्मचिंतन करना होगा, ताकि विकास की राह में विनाश की संभावनाएँ नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और लोकतांत्रिक परिपक्वता का मार्ग प्रशस्त हो सके।
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