औषधीय वनस्पतियों पर आधारित स्वदेशी स्टार्टअप की सशक्त मिसाल शिखा अग्रवाल

0
7

दिव्य हिमगिरि से पूनम आर्य की दिव्यमोल की संस्थापक शिखा अग्रवाल से खास बातचीत

अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा पृष्ठभूमि के बारे में बताएं
मेरा पालन-पोषण और शिक्षा हरि की नगरी हरिद्वार में हुई है। मेरा परिवार शिक्षित, अनुशासित और कर्मप्रधान मूल्यों में विश्वास रखने वाला रहा है। मेरे पिता भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड से संबद्ध भारत नवरत्न संस्थान में कार्यरत रहे हैं, जबकि मेरी माता जी सरकारी विद्यालय में शिक्षिका के पद पर सेवाएं दे चुकी हैं। माता-पिता से मुझे ईमानदारी, परिश्रम, अनुशासन और आत्मनिर्भरता जैसे संस्कार मिले, जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मैंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हरिद्वार से पूर्ण की। इसके पश्चात मेरठ विश्वविद्यालय से जीवविज्ञान विषय में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। परास्नातक की पढ़ाई मैंने राजकीय डिग्री कॉलेज, ऋषिकेश से पूरी की। अध्ययन के दौरान मेरे प्राध्यापकों ने मुझे शोधात्मक सोच विकसित करने और प्रकृति के साथ गहराई से जुड़ने की प्रेरणा दी। विशेष रूप से पेड़-पौधों और औषधीय वनस्पतियों के प्रति मेरी रुचि इसी समय विकसित हुई।
आत्मनिर्भर बनने की इच्छा मेरे भीतर शुरू से ही रही है। मैं चाहती थी कि अपना स्वयं का कार्य करूँ और भविष्य में दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर सृजित कर सकूँ। आज अपने पति के सहयोग से मैं न केवल एक सफल वैवाहिक जीवन जी रही हूँ, बल्कि अपने सपनों को भी साकार करने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही हूँ।

आपके प्रोफेशन या स्टार्टअप के बारे में बताएं और आप किससे प्रभावित हुईं
मैं उत्तराऽंड की समृद्ध प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत से बचपन से परिचित रही हूँ। हमारे पहाड़ी क्षेत्र औषधीय जड़ी-बूटियों का विशाल भंडार हैं, जिनका वैज्ञानिक और व्यावसायिक उपयोग अभी भी सीमित रूप में ही हो पा रहा है। इसी सोच ने मुझे उत्तराऽंड की पारंपरिक जड़ी-बूटियों पर गहन अध्ययन के लिए प्रेरित किया। अपने शोध के दौरान मैंने विशेष रूप से बिच्छू घास पर कार्य किया, जिसके औषधीय गुण अत्यंत प्रभावशाली हैं। वर्तमान में मैं बिच्छू घास से दर्द निवारक तेल, बालों के लिए पोषक तेल तथा हर्बल चाय जैसे उत्पाद तैयार कर रही हूँ। इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए मैंने अपने स्टार्टअप फ्दिव्यमोलय् की शुरुआत की।
इस कार्य की प्रेरणा मुझे तब मिली जब मैंने अपनी माँ के जोड़ों के दर्द के उपचार के लिए बिच्छू घास से तेल तैयार किया। जब उन्हें इससे वास्तविक लाभ मिला, तब मुझे महसूस हुआ कि यह ज्ञान केवल परिवार तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज के हित में भी इसका उपयोग होना चाहिए। मैं अपनी माँ और अपने पति की कार्यशैली, उनके सकारात्मक दृष्टिकोण और समाज के प्रति उनकी संवेदनशीलता से अत्यधिक प्रभावित रही हूँ। इसके साथ ही वे लोग भी मेरी प्रेरणा रहे हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखे और उन्हें साकार कर दिखाया।

आपकी उपलब्धियों के बारे में बताएं, आपने अब तक क्या कार्य किया है?
मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि मेरे उत्पादों से लोगों को वास्तविक स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हुआ है और उनके जीवन की गुणवत्ता में सकारात्मक बदलाव आया है। ग्राहकों की प्रतिक्रिया ने मुझे अपने कार्य के प्रति और अधिक समर्पित होने की प्रेरणा दी, जिससे मेरा अनुभव और पहचान दोनों बढ़े।
हाल ही में विज्ञान धाम, देहरादून में आयोजित राज्य के छठे देहरादून अंतरराष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी महोत्सव-2025 के अंतर्गत रूरल एंटरप्रेन्योरशिप एंड स्टार्टअप कॉन्क्लेव में मुझे मेरे उत्पादों और नवाचार के लिए राज्य नीति आयोग के निदेशक डॉ- मनोज पंत द्वारा सम्मानित किया गया। यह सम्मान मेरे लिए गर्व और जिम्मेदारी दोनों का प्रतीक है।

आपके भविष्य की योजनाएँ क्या हैं?
भविष्य में मेरी योजना है कि मैं अपने स्टार्टअप फ्दिव्यमोलय् को और अधिक सुदृढ़ एवं विस्तारित करूँ। मैं चाहती हूँ कि मेरा कार्य केवल आर्थिक सफलता तक सीमित न रहे, बल्कि समाज और पर्यावरण के लिए भी लाभकारी सिद्ध हो। आने वाले समय में मैं युवाओं, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रें की महिलाओं और युवतियों के लिए रोजगार एवं मार्गदर्शन के अवसर सृजित करना चाहती हूँ। मेरे उत्पाद वर्तमान में गूगल सर्च पर लोकप्रिय उत्पादों की सूची में ऊपर स्थान प्राप्त कर रहे हैं, जो मेरे लिए उत्साहवर्धक है। इसके साथ-साथ मैं बिच्छू घास से जुड़े अन्य उत्पादों पर भी निरंतर शोध कर रही हूँ, ताकि इसके औषधीय लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सकें।

आप हमारी पत्रिका के माध्यम से क्या संदेश देना चाहेंगी
मैं आपकी दिव्य हिमगिरी पत्रिका के माध्यम से युवाओं को यह संदेश देना चाहूँगी कि सपने देऽना आवश्यक है, लेकिन उनसे भी अधिक जरूरी है उन सपनों के लिए निरंतर प्रयास करना। असफलताओं से घबराने के बजाय उनसे सीखें, क्योंकि वही हमें मजबूत बनाती हैं। आत्मविश्वास, धैर्य और ईमानदारी के साथ किया गया कोई भी प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और नीयत सच्ची हो तो सफलता अवश्य मिलती है।

Previous articleखून से लथपथ हुआ देहरादून का “हृदय”
Next articleपरीक्षा पर चर्चा अब राष्ट्रीय आंदोलन, स्कूली परीक्षा चुनौति नहीं बल्कि परिपक्व होने का एक पड़ाव है: मुख्यमंत्री

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here