एक कहानी थाली और टैबलेट की

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जब सेहत टैबलेट में ढूंढी जाने लगी…
सुबह के 8 बजे थे। ऋतु अपनी रसोई में खड़ी थी-एक हाथ में चाय का कप और दूसरे हाथ में 4 अलग-अलग डिब्बे। कैल्शियम, विटामिन डी, मल्टी-विटामिन, और एक “एनर्जी बूस्टर” कैप्सूल। उसने जल्दी से सब गोलियां पानी के साथ निगल ली और फिर बिना नाश्ता किए ऑफिस के लिए निकल गई। क्या यह दृश्य आपको जाना-पहचाना लगता है? आजकल हम सब ने सेहत को टैबलेट में ढूंढना शुरू कर दिया है। हमें लगता है कि एक कैप्सूल हमारी थकान मिटा देगा, एक टैबलेट हमारी इम्युनिटी बढ़ा देगी। लेकिन कहीं न कहीं, इस दौड़ में हम एक बहुत बुनियादी बात भूल गए हैं- “खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर को जीवन देने के लिए होता है।”
जब हम एक ताजा फल या सब्जी खाते हैं, तो हम सिर्फ विटामिन नहीं लेते…
हम लेते हैं जीवित ऊर्जा, फाइटोकेमिकल्स, एंजाइम्स और प्रकृति का एक सम्पूर्ण उपहार। ये वही तत्व हैं जो किसी भी टैबलेट में पूरी तरह से नहीं आ सकते।
एक संतरा और एक टैबलेट की कहानी सोचिए…
आपके सामने दो चीजें रखी हैं, एक तरफ एक चमकता हुआ संतरा और दूसरी तरफ एक विटामिन सी की टैबलेट। दोनों का लेबल कहता है- “विटामिन सी”, विज्ञान भी कहता है-दोनों में एस्कॉर्बिक एसिड है। तो फिर फर्क क्या है? फर्क है “जिंदगी” का।
संतरा सिर्फ विटामिन सी नहीं है…
उसमें वो सारे अदृश्य तत्व होते हैं जो शरीर को सही तरीके से उस विटामिन को अवशोषित करने में मदद करते हैं। इसे कहते हैं-पोषक तत्वों का साथ मिलकर काम करना, यानी न्यूट्रिएंट सिनर्जी। जैसे एक टीम मिलकर मैच जीतती है, वैसे ही पोषक तत्व भी मिलकर शरीर को स्वस्थ बनाते हैं। विटामिन बी अकेला कमजोर होता है, लेकिन बी-कॉम्प्लेक्स शक्तिशाली होता है। कैल्शियम अकेला अधूरा है, विटामिन डी और मैग्नीशियम के साथ ही मजबूत बनता है। लेकिन जब हम सिर्फ एक ही सप्लीमेंट लेते हैं, तो यह वैसा ही है जैसे एक खिलाड़ी से पूरा मैच जीतने की उम्मीद करना।
सच्चाई जो हर किसी को जाननी चाहिए।
एक दिन ऋतु मेरे क्लिनिक आई, थकी हुई, ऊर्जा की कमी से जूझती हुई और उलझन में। उसने कहा: “मैम, मैं इतने सप्लीमेंट्स लेती हूं, फिर भी मुझे फर्क क्यों नहीं पड़ रहा?” मैंने उससे सिर्फ एक सवाल पूछाः “आप अपनी थाली में क्या लेती हैं?” बस वहीं से उसकी यात्रा बदल गई। धीरे-धीरे उसने अपनी डाइट में मौसमी फल, घर का बना खाना, ताजी सब्जियां और संतुलित आहार शामिल किया। कुछ ही हफ्तों में उसने महसूस किया। ऊर्जा बढ़ रही है, पाचन सुधर रहा है, मन हल्का और ताजा लग रहा है, उसने मुस्कुराते हुए कहा-
“मैम, लगता है मेरी रसोई ही मेरी दवा की दुकान है….”
अंतिम संदेश वापस थाली की ओर यह लेख सप्लीमेंट्स के खिलाफ नहीं है, बल्कि उनके सही उपयोग के लिए है। कुछ परिस्थितियों में सप्लीमेंट्स जरूरी होते हैं जैसे खून की कमी की स्थिति, गर्भावस्था या किसी विशेष रोग में। लेकिन बिना समझ के उनका उपयोग करना शरीर के लिए लाभकारी नहीं होता। अगर हम हर समस्या का समाधान टैबलेट में ढूंढेंगे, तो हम अपने शरीर की असली जरूरत को नजरअंदाज कर देंगे। तो आज एक छोटा सा कदम उठाइए अपनी थाली को रंग-बिरंगी, प्राकृतिक और पोषक बनाइए। क्योंकि सच्चाई यह है-
“जब थाली सही हो जाती है, तो दवा की जरूरत धीरे-धीरे कम हो जाती है।”

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