
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद में एक गांव है खजूरी अकबरपुर जहां की मिटटी शहीद भूमि कहलाती है।जिस उम्र में युवा अपनी पढ़ाई कर बेहतर भविष्य के सपने बुनते है उसी 17 वर्ष की उम्र में इसी गांव के छात्र जगदीश प्रसाद वत्स ने भारत मां को आजाद कराने के लिए हरिद्वार में सीने पर गोलियां खाकर देशप्रेम व बहादुरी का एक इतिहास लिखा था। इस गांव के जगदीश प्रसाद स्मारक विद्यालय के कुछ बच्चों को प्रकाशवती मदनलाल शर्मा छात्र प्रतिभा सम्मान प्रदान करने के लिए उत्तराखंड के राज्य मंत्री स्तर श्यामवीर सैनी, उत्तराखंड के संस्कृत शिक्षा निदेशक रहे डॉ आनन्द भारद्वाज मेरे साथ 30 मार्च को शहीद भूमि को नमन करने गए। जिन्होंने जगदीश वत्स को शहीद भगत सिंह के समतुल्य बताया। 17 वर्षीय जगदीश प्रसाद वत्स, जिन्होंने सन 1942 में हरिद्वार के ऋषिकुल आयुर्वेदिक कॉलेज में पढ़ते हुए आजादी का बिगुल बजाया था। कालेज के छात्रों का नेतृत्व करते हुए 17 वर्षीय जगदीश प्रसाद वत्स ने तिंरगे झण्डे हाथ में लेकर अंग्रेज पुलिस को चुनौती देने का साहस किया था। 13 अगस्त सन 1942 की रात्रि में छात्रावास में हुई छात्रो की एक बैठक में 14 अगस्त को तिरंगे फैहराने के लिए सडको पर निकलने और भारत माता की जय, इंकलाब जिन्दाबाद के नारे लगाने के लिए, लिए गए निर्णय को अमलीजामा पहनाते हुए छात्रों का दल 14 अगस्त की सवेरे ही हरिद्वार की सडको पर निकल पडा था। पुलिस की छावनी के बीच भी जब छात्र जगदीश प्रसाद वत्स ने सुभाष धाट पर पहला तिरंगा फैहराया तो अंग्रेज पुलिस की एक गोली उनके बाजू को चीरती हुई निकल गई। धायल जगदीश ने धोती को फाडकर धाव पर बांध लिया और फिर दुसरा तिरंगा फैहराने के लिए डाकधर की तरफ दौड लगा दी। पुलिस की गोली चलने से बाकी छात्र तो तितर बितर हो गए थे, लेकिन 17 वर्षीय जगदीश तिरंगे फैहराने की जिद पर अडिग रहा और उसने दौडते हुए जाकर दुसरा तिरंगा डाकधर पर फैहरा दिया। वहां भी पुलिस ने गोली चलाई जो जगदीश के पैर में लगी। जगदीश ने फिर पटटी स्टेशन पर पहुंचकर पाइप के रास्ते उपर चढकर तीसरा तिरंगा फैहरा दिया। जैसे ही जगदीश तिरंगा फैहराकर नीचे उतरा तो राजकीय रेलवे पुलिस के इन्सपैक्टर प्रेम शंकर श्रीवास्तव ने उन्हे धेर लिया। जगदीश ने तांव में आकर एक थप्पड इन्सपैक्टर श्रीवास्तव को जड़दिया, जिससे वह नीचे गिर पडा। इन्सपैक्टर ने नीचे पडे पडे ही एक गोली जगदीश को मार दी जो उनके सीने में लगी। तीसरी गोली लगते ही जगदीश मुर्छि्त हो गया। जिन्हे इलाज के लिए देहरादून सेना अस्पताल ले जाया गया। बताते है कि वहां जगदीश को एक बार होश आया था और उनसे माफी मांगने को कहा गया था परन्तु माफी न मांगने पर उन्हे कथित रूप में जहर का इंजेक्शन देकर उनकी हत्या कर दी गई।

सहारनपुर जिले के ग्राम खजूरी अकबरपुर निवासी जगदीश वत्स का शव भी पुलिस ने उनके पिता पंडित कदम सिंह शर्मा को नही दिया था। उल्टे दुस्साहसी अंग्रेजो ने जगदीश वत्स को गोली मारने वाले पुलिस इन्स्पैक्टर प्रेम शंकर श्रीवास्तव को पुलिस मैडल प्रदान किया था। लेकिन देश आजाद होने पर प्रथम प्रधान मन्त्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जगदीश वत्स की राष्टृभक्ति व वीरता की प्रंशसा करते हुए एक विजय टृाफी वत्स परिवार को दी थी। जो धरोहर के रूप में आज भी सुरक्षित है। जगदीश प्रसाद वत्स की स्मृति में उनके गांव खजूरी अकबरपुर में एक जूनियर हाई स्कूल की स्थापना सन 1966 में उनके नाम पर की गई थी।जो आज भी जूनियर हाई स्कूल ही है। वही उनकी स्मृति में एक अस्पताल है, जो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से आगे नही बढ़ पाया, वही उनके नाम पर एक सडक है, जो जीर्णशीर्ण हालत में अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। अलबत्ता हरिद्वार के भल्ला पार्क में शहीद जगदीश वत्स की प्रतिमा लगाई गई है। ऋषिकुल आयुर्वेदिक कालेज में भी उनकी प्रतिमा स्थापित की हुई है। इसी कॉलेज में प्रतिवर्ष उनकी याद में एक वालीबाल टूर्नामेन्ट कराया जाता है। अमर शहीद जगदीश प्रसाद वत्स के परिवार में किसी भी आश्रित ने सरकार से स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी पेंशन या अन्य कोई सम्मान या सरकारी सहायता आज तक स्वीकार नही की।जबकि जगदीश की शहादत के एक वर्ष के अन्दर उनके माता पिता की मृत्यु हो गई थी और घर में परिवार के नाम पर शहीद जगदीश की 15 वर्षीय छोटी बहन प्रकाशवती, 13 वर्षीय छोटी बहन चन्द्रकला, 10 वर्षीय छोटी बहन सुरेश वती और मात्र 5 वर्षीय छोटा भाई सुरेश दत्त वत्स रह गए थे। जिनके पालन पोषण की जिम्मेदारी 15 वर्षीय बहन प्रकाश वती पर आन पडी थी तो भी सरकारी सहायता को ठुकरा देना आजादी के बाद की एक बडी मिशाल है। फिर भी सरकार चाहती तो शहीद जगदीश वत्स की स्मृति में उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर अंतर्गत ग्राम खजूरी अकबरपुर में पचास वर्षों से चल रहे जगदीश प्रसाद स्मारक विद्यालय को जूनियर हाईस्कूल से पहले हाई स्कूल और फिर इंटर किया जा सकता है।सही मायनों में जनपद सहारनपुर व हरिद्वार का यह एक मात्र शहीद जगदीश प्रसाद वत्स मरणोपरांत ‘भारत रत्न ‘सम्मान का हकदार है। क्या उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड की सरकारें इस बाबत पहल करेगी?या फिर देश के लिए यह शहादत यूं ही इतिहास के पन्नो में भूला दी जाएगी। (लेखक अमर शहीद जगदीश प्रसाद वत्स के भान्जे व वरिष्ठ पत्रकार है)





