देहरादून की पॉश राजपुर रोड पर स्थित रोमियो लेन बार में देर रात चली कार्रवाई ने उत्तराखंड पुलिस के भीतर एक असहज सच्चाई को सामने ला दिया है। 26 अप्रैल की रात ‘नाइट स्ट्राइक’ के तहत तय समय के बाद खुले बार को बंद कराने पहुंची पुलिस टीम की कार्रवाई अचानक उस वक्त सुर्खियों में आ गई, जब मौके पर ही दो बड़े अधिकारियों के बीच कथित टकराव की बात सामने आई। आरोप है कि कार्रवाई के दौरान पुलिस महानिरीक्षक गढ़वाल राजीव स्वरूप की मौजूदगी में कुछ देर के लिए कार्रवाई प्रभावित हुई, जबकि बाद में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमेन्द्र डोबाल को खुद मौके पर पहुंचकर स्थिति संभालनी पड़ी। घटना ने महज नियम उल्लंघन से आगे बढ़कर पुलिस व्यवस्था के भीतर समन्वय, अधिकार और अनुशासन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने स्तर पर सफाई दी है, लेकिन मामला अब पुलिस मुख्यालय तक पहुंच चुका है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) डॉ. वी. मुरुगेशन ने पुलिस महानिरीक्षक और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से 24 घंटे में रिपोर्ट तलब की है, हालांकि रिपोर्ट अभी सामने नहीं आई है। वहीं सच्चाई तक पहुंचने के लिए सीसीटीवी फुटेज की जांच भी शुरू कर दी गई है। अब नजर इस बात पर है कि आखिर उस रात हुआ क्या था और जवाब किसके पक्ष में जाता है। दिव्य हिमगिरि रिपोर्ट।
राजधानी देहरादून की सजी-धजी राजपुर रोड, जहां देर रात तक शहर की रफ्तार थमती नहीं, वहीं एक बार की कार्रवाई ने पूरे पुलिस महकमे में हलचल मचा दिया । रोमियो लेन बार पर हुई यह कार्रवाई अब महज एक ‘नाइट स्ट्राइक’ का हिस्सा नहीं रही, बल्कि यह मामला उस मोड़ पर पहुंच गया है जहां सवाल सिर्फ नियमों का नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर तालमेल और अधिकारों की सीमा का भी है। 26 अप्रैल की रात, जब शहर में पुलिस टीमें बार और रेस्टोरेंट्स की तय समय सीमा के अनुपालन की जांच कर रही थीं, उसी दौरान इस बार के तय समय के बाद खुले होने की सूचना मिली। पुलिस टीम मौके पर पहुंची और कार्रवाई शुरू हुई। बताया गया कि बार रात 1 बजे तक संचालित हो रहा था, जबकि नियमों के अनुसार इसे रात 12 बजे तक बंद होना चाहिए था। कार्रवाई के दौरान माहौल तब अचानक बदल गया, जब मौके पर आईजी गढ़वाल राजीव स्वरूप की मौजूदगी की बात सामने आई। आरोप लगे कि उन्होंने कार्रवाई पर सवाल उठाए, जिससे कुछ समय के लिए पुलिस की कार्रवाई धीमी पड़ गई। हालांकि इस बीच स्थिति संभालने के लिए एसएसपी देहरादून प्रमेन्द्र डोबाल को खुद मौके पर पहुंचना पड़ा और अंततः बार को बंद कराया गया। इस पूरी घटना ने पुलिस विभाग के भीतर समन्वय पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आमतौर पर उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत शांत राज्य में इस स्तर के अधिकारियों के बीच इस तरह का सार्वजनिक विवाद कम ही देखने को मिलता है। यही वजह है कि मामला तेजी से चर्चा का विषय बन गया। आईजी राजीव स्वरूप ने अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वह उस समय अपने परिवार के साथ उस क्षेत्र से गुजर रहे थे। उन्होंने बताया कि एक ही जगह भारी पुलिस बल की तैनाती देखकर उन्होंने सामान्य तौर पर जानकारी लेनी चाही थी। उनके मुताबिक, उनके खिलाफ फैलाई जा रही बातें भ्रामक हैं और वास्तविकता से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वहीं दूसरी ओर एसपी सिटी प्रमोद कुमार ने भी स्पष्ट किया कि वह उस समय सीधे मौके पर मौजूद नहीं थे और अलग-अलग टीमों के जरिए अभियान चलाया जा रहा था। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर उनका नाम जोड़कर जो बातें कही जा रही हैं, वे सही नहीं हैं। घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मौके पर मौजूद अधिकारियों के बीच संवाद की कमी थी या फिर आदेशों को लेकर कोई भ्रम की स्थिति बनी। शहर के बीचोंबीच हुई इस घटना ने पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर आम लोगों के बीच भी चर्चा को जन्म दे दिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने आम जनता के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब वरिष्ठ स्तर के अधिकारी ही एक मत नहीं दिखते, तो जमीनी स्तर पर कानून व्यवस्था कितनी प्रभावी रह पाएगी। खासकर ऐसे समय में जब राज्य में पर्यटन सीजन और चारधाम यात्रा जैसे बड़े आयोजन शुरू होने वाले हैं, पुलिस की एकजुटता और स्पष्ट कार्रवाई बेहद अहम मानी जाती है।
पुलिस मुख्यालय सख्त, सीसीटीवी जांच से खुलेगा सच, रिपोर्ट का इंतजार
मामला तूल पकड़ने के बाद पुलिस मुख्यालय ने इसमें तत्काल हस्तक्षेप किया है। एडीजी (कानून-व्यवस्था) डॉ. वी. मुरुगेशन ने आईजी गढ़वाल और एसएसपी देहरादून दोनों से 24 घंटे के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी । हालांकि खबर लिखे जाने तक यह रिपोर्ट मुख्यालय को प्राप्त नहीं हुई है और सभी की नजर अब उसी पर टिकी हुई है।पुलिस मुख्यालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई जानने के लिए मौके के सीसीटीवी फुटेज की जांच कराई जा रही है। यह जांच इस बात को स्पष्ट करेगी कि कार्रवाई के दौरान वास्तव में क्या हुआ, किस स्तर पर क्या निर्देश दिए गए और क्या किसी स्तर पर कार्रवाई में बाधा आई। मुख्यालय इस मामले को केवल अनुशासन के नजरिए से नहीं, बल्कि पुलिसिंग के पेशेवर मानकों के आधार पर भी देख रहा है। यह जांच यह तय करेगी कि क्या किसी अधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर हस्तक्षेप किया या फिर यह केवल एक सामान्य स्थिति थी जिसे गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उत्तराखंड पुलिस में इस तरह के मामलों को गंभीरता से लिया जाता है, क्योंकि यहां की कार्यप्रणाली आमतौर पर समन्वित और शांत मानी जाती है। ऐसे में यह मामला विभाग के लिए एक ‘टेस्ट केस’ की तरह भी देखा जा रहा है, जिसमें यह तय होगा कि भविष्य में इस तरह की परिस्थितियों से कैसे निपटा जाए। इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी दिखाया है कि जमीनी स्तर पर चल रही कार्रवाई और उच्च अधिकारियों के बीच बेहतर कम्युनिकेशन कितना जरूरी है। यदि आदेश और अधिकार स्पष्ट न हों, तो ऐसी स्थिति दोबारा भी बन सकती है। फिलहाल, पूरे मामले की सच्चाई अब उस रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज पर निर्भर है, जो आने वाले समय में तस्वीर को साफ करेगी। तब तक यह मामला न सिर्फ देहरादून, बल्कि पूरे उत्तराखंड के पुलिस महकमे में चर्चा का केंद्र बना रहेगा।






