उत्तराखंडियत का आत्मघाती चेहरा हैं हरीश रावत

0
2

हरीश रावत ने फेसबुक में अपनी एक पोस्ट में लिखा कि “मैं 2002 में मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार था मगर निर्णय श्री नारायण दत्त तिवारी जी के पक्ष में हुआ। जिन्होंने कभी कहा था कि राज्य मेरी लाश की कीमत पर बनेगा।” हरीश रावत की इस पोस्ट से उत्तराखंडियत को बहुत नुकसान पहुंचा हैं। पृथक राज्य निर्माण के आंदोलन में आहुति देने वाले हजारों-लाखों आंदोलनकारियों और शहीद परिवारों की भावनाओं को हरीश रावत ने एक झटके में उत्तराखंड विरोधी बता दिया। अब हरीश रावत की कही इस बात का संदर्भ कहीं नहीं मिलता सिवाय उनके शब्दों के। पेश है हरीश रावत की पोस्ट से उत्तराखंडियत को पहुंचे आघात पर एक रिपोर्ट

पिछले कुछ दिनों से उत्तराखंड में विपक्ष के वरिष्ठ नेता 77 वर्षीय नेता हरीश रावत चर्चाओं में हैं। वैसे तो हरीश रावत 2014 से ही जब वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने, किसी न किसी बात को लेकर चर्चाओं में एक खलनायक के रूप में चर्चित रहे हैं। चाहे उनके कार्यकाल में डेनिस शराब घोटाला हो, नेशनल हाइवे मुआवजा घोटाला हो या फिर खनन घोटाला हो। लेकिन इसबार वह चर्चाओं में हैं काँग्रेस में रहकर काँग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोलने को लेकर। अपनी हठधर्मिता को लेकर नकारात्मक राजनीति के धुरंधर माने जाने वाले 77 वर्षीय राजनेता उम्र के इस दौर में आकर उत्तराखंड पृथक राज्य निर्माण में योगदान देने वाले उत्तराखंड के निर्माता राजनेताओं और उनके तमाम हजारों राज्य आआंदोलनकारी समर्थकों एवं शहीद परिवारों को उत्तराखंड विरोधी बताकर उत्तराखंडियत को बदनाम कर रहे हैं। एक अंसतुष्ट गुटनायक के रूप में काँग्रेस के खिलाफ बयानबाजी करते हुए हरीश रावत ने फेसबुक में अपनी एक पोस्ट में लिखा कि “मैं 2002 में मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार था मगर निर्णय श्री नारायण दत्त तिवारी जी के पक्ष में हुआ। जिन्होंने कभी कहा था कि राज्य मेरी लाश की कीमत पर बनेगा, जिन्होंने उत्तराखंड से पीसीसी का मेंबर बनने का अनुरोध भी अस्वीकार कर दिया था, वही मुख्यमंत्री बने और पाँच साल शानदार तरीके से सरकार चली, और कभी सरकार के अस्तित्व को खतरा पैदा हो ऐसी स्थिति हमने आने नहीं दी।” हो सकता है कि हरीश रावत ने चुनावी समर में यह बात फेसबुक पर इसलिए लिखी हो कि कांग्रेस उनके दबाव में आ जाए और उनके सामने नतमस्तक हो जाए। लेकिन उनकी इस पोस्ट से उत्तराखंडियत को बहुत नुकसान पहुंचा हैं। पृथक राज्य निर्माण के आंदोलन में आहुति देने वाले हजारों-लाखों आंदोलनकारियों और शहीद परिवारों की भावनाओं को हरीश रावत ने एक झटके में उत्तराखंड विरोधी बता दिया।
अब हरीश रावत की कही इस बात का संदर्भ कहीं नहीं मिलता सिवाय उनके शब्दों के। लेकिन जब इतिहास के पन्ने उलटे पलटे जाएंगे तो पता चलता है कि रामपुर तिराहा कांड के समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे और उसको कांग्रेस पार्टी के 28 विधायकों का बाहर से समर्थन था। 01 सितंबर 1994 को खटीमा में आंदोलनकारियों पर पुलिस गोली से 07 तथा 02 सितंबर को मसूरी में पुलिस गोली से 06 आंदोलनकारी शहीद हो गए थे। नारायण दत्त तिवारी ने इस घटना के विरोध में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव से मुलायम सिंह यादव सरकार से समर्थन वापिस लेने को दबाव बनाया। नारायण दत्त तिवारी उस समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। नारायण दत्त तिवारी ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी में मुलायम सिंह यादव सरकार से समर्थन वापिस लेने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास कराया लेकिन पीवी नरसिंह राव ने उस प्रस्ताव की उपेक्षा की। नारायण दत्त तिवारी ने 05 सितंबरए 1994 को लखनऊ में शहीद स्मारक पर आंदोलनकारियों पर हुए बर्बर गोलीकांड के विरोध में मुलायम सिंह यादव सरकार के खिलाफ विशाल धरना प्रदर्शन किया था। नारायण दत्त तिवारी मसूरी और खटीमा में आंदोलनकारियों पर हुए पुलिसिया गोलीबारी से इस कदर व्यथित हुए कि उन्होंने 26 सितंबर 1994 को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। 02 अक्टूबर 1994 को रामपुर तिराहा कांड हो गया, पुलिस की बर्बर कार्यवाही में 15 आंदोलनकारी मौके पर ही शहीद हो गए। महिलाओं से बालात्कार तक हुआ। नारायण दत्त तिवारी ने नवंबर 1994 में मुजफ्फरनगर में इस हिंसक घटना के खिलाफ एक अभूतपूर्व रैली का आयोजन किया। 5 लाख लोगों की भीड़ ने रामपुर तिराहा पर नारायण दत्त तिवारी को सुनने के लिए शाम तक इंतजार किया था। 01 फरवरी 1995 में लखनऊ में नारायणदत्त तिवारी के नेतृत्व में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंइ, मोहसिना किदवई, शीला दीक्षित, केदारनाथ सिंह, माखनलाल फोतेदार आदि ने मुलायम सिंह यादव सरकार के खिलाफ राज्य व्यापी सत्याग्रह का बिगुल बजाया। लेकिन इन सभी विरोध के बावजूद पीवी नरसिंह राव ने मुलायम सिंह यादव से समर्थन वापिस नहीं लिया। खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा बर्बर गोलीकांड के बाद भी मुलायम सिंह यादव की सरकार निर्वाध रूप से कांग्रेस के समर्थन से चलती रही। मुलायम सिंह यादव की सरकार गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती द्वारा समर्थन वापिस लेने के कारण जून 1995 में गिरी थी।
तो सवाल तो उत्तराखंडियत को बदनाम करने वाले हरीश रावत से बनता है कि उस वक्त वो कहां थे? वो पीवी नरसिंह राव के साथ खड़े थे, जो मुलायम सिंह यादव को संरक्षण और समर्थन दे रहे थे या फिर उत्तराखंड के शहीद आंदोलनकारियों के पक्ष में खड़े थे?
यहां यह उल्लेख किया जाना समीचीन होगा कि 10-11 जून, 1994 में दिल्ली में पीवी नरसिंह राव की अध्यक्षता में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का विशेष महाअधिवेशन बुलाया गया था। महाधिवेशन में नारायण दत्त तिवारी ने पृथक उत्तराखंड राज्य के निर्माण के लिए राजनैतिक प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने इसे स्वीकार नहीं किया। यही नहीं इस अधिवेशन में झारखंड और छत्तीसगढ़ पर भी कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था। जबकि उस वक्त उत्तर प्रदेश का पर्वतीय क्षेत्र पृथक राज्य आंदोलन में झुलस रहा था। दबाव में अगस्त के अंतिम सप्ताह में पीवी नरसिंह राव ने प्रधानमंत्री आवास में कुमायूं और गढ़वाल के कांग्रेसी नेताओं और अन्य दलों के साथ अलग-अलग मुलाकात की और उत्तराखंड पृथक राज्य आंदोलन पर विचार किया था। कांग्रेस नेताओं की इस बैठक में नारायण दत्त तिवारी, हरीश रावत, रंजीत सिंह रावत, विजय बहुगुणा, प्रीतम सिंह, सुबोध उनियाल आदि बड़ी संख्या में कांग्रेस के नेता भी शामिल थे। पृथक राज्य गठन के मुद्दे पर जब नारायण दत्त तिवारी को बोलने का मौका आया तो नारायण दत्त तिवारी ने कहा था “मैं तो विकास का सिपाही हूँ और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए छोटे राज्यों के गठन का पक्षधर हूँ। उन्होंने अपना व्यक्तव्य आगे बढ़ाते हुए कहा संयुक्त प्रांत और बाद में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री श्री गोविंद बल्लभ पंत ने छोटे राज्य यथा उत्तराखंड के पृथक गठन पर कहा था कि यदि किसी ने गंगा-जमुना संस्कृति को विभाजित करने की कोशिश की तो उसे मेरी लाश पर से होकर गुजरना होगा।”
यह इतिहास के पन्नों पर दर्ज है कि हरीश रावत जो उस वक्त उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव सरकार को समर्थन और संरक्षण दे रहे पीवी नरसिंह राव के पक्ष में खड़े थे. ने गोविंद बल्लभ पंत के शब्दों को नारायण दत्त तिवारी के शब्द कहकर प्रचारित किया। उस समय उस बैठक में आंदोलन के साक्षी तथा राज्य निर्माण में अपना योगदान देने वाले उपस्थित तमाम कांग्रेस के नेता इस बात के साक्षी हैं कि जो शब्द हरीश रावत आज स्वर्गीय नारायणदत्त तिवारी के मुंह में डालने का प्रयास कर रहे हैं वो उन्होंने कभी कहे ही नहीं बल्कि पृथक राज्य आंदोलन के समर्थन उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और अपनी ही पार्टी के मुखिया पीवी नरसिंह राव के खिलाफ अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन किया। इसी विरोध की परिणि ाति थी कि पीवी नरसिंह राव ने नारायणदत्त तिवारी, एचकेएल भगत, अर्जुन सिंह, एमएल फोतेदान आदि को पार्टी से निष्कासित कर दिया था।

हरीश रावत के नेतृत्व का एक आकलन किया जा सकता है। जब वह मुख्यमंत्री बने तो उनकी पसंद के और उनके खास तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष किशोर उपाध्याय से उनका राजनैतिक बैर हो गया। उनके नेतृत्व में ही गुटबाजी के कारण एक दर्जन कांग्रेस विधायक कांग्रेस छोडकर भाजपा में शामिल हो गए। किसी समय उनके खास रहे प्रीतम सिंह जब प्रदेशाध्यक्ष बने तो उनके साथ भी हरीश रावत का राजनैतिक बैर हो गया। प्रीतम के बाद प्रदेशाध्यक्ष बने उनके सगे रिश्तेदार करन माहरा से भी उनका तालमेल नहीं बना। हरीश रावत की कृपा से प्रदेशाध्यक्ष बने गणेश गोदियाल से भी उनका छत्तीस का आंकडा हो गया। उनके राजनैतिक सलाहकार रहे रणजीत रावत के साथ भी उनका विरोध हो गया। यदि आप कुमायूं क्षेत्र में कांग्रेस की राजनीति का सिंहावलोकन करें तो तीन दर्जन जनाधार वाले ऐसे नेताओं के नाम सामने आएंगे जिनके उभरते नेतृत्व को हरीश रावत के अपनी महत्वाकांक्षाओं के नीचें रौंद दिया।


यह दस्तावेज हैं कि गोविंद बल्लभ पंत अखंड उत्तर प्रदेश के पक्षधर थे। पृथक उत्तराखंड राज्य गठन की मांग संयुक्त प्रांत के समय से हो प्रारंभ हो गई थी और यह मुद्दा गोविंद बल्लभ पंत के सामने भी प्रमुखता से आया था। क्योंकि उस वक्त देश कई हिस्सों में भाषाई और क्षेत्रीय असमानता के आधार पर छोटे राज्यों के गठन की मांग हो रही थी। आज इतिहास को गलत ढंग से पेश करके उत्तराखंडियत की आत्मा पर हरीश रावत ने जो प्रहार किया है इसके उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन से जुड़े लोग हरीश रावत को कभी माफ नहीं करेंगे।
इसके उलट यदि हम हरीश रावत के संसदीय कार्यकाल की बात करें तो हरीश रावत 1980, 1984, 1989 और 2009 के चुनाव में जीते जब कांग्रेस देशभर में मजबूत लहर पर सवार थी। 2009 में हरिद्व ार सीट पर उनकी जीत भी उसी व्यापक राजनीतिक माहौल का हिस्सा थी, जब उत्तराखंड की सभी लोकसभा सीटें कांग्रेस ने जीती थीं।
जिस संदर्भ में हरीश रावत ने नारायणदत्त तिवारी पर आरोप लगाया है- विधानसभा 2002 का उदाहरण भी यही दिखाता है कि कांग्रेस की जीत कई बार व्यक्तिगत नेतृत्व से ज्यादा परिस्थितियों के कारण हुई यदि सतपाल महाराज उस समय इस्तीफे का दबाब बनाकर 7 टिकट नहीं बदलवाते तो कांग्रेस सत्ता में नहीं आ सकती थी। 2012 में भी कांग्रेस भाजपा सरकार के खिलाफ लहर पर चुनाव जीतकर आई थी। हरीश रावत ने यह संदर्भ नहीं लिखा कि 2014 में उनको सरकार थाली में सजाकर दी गई थी। यानि नेतृत्व परिवर्तन करके उनको मुख्यमंत्री बनाया गया था। उनकी असली परीक्षा आई 2017 और 2022 में तब क्या हुआ? पार्टी हारी, और मुख्यमंत्री का चेहरा खुद भी दोनो विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाया। यही नहीं 2017 में हरीश रावत बतौर मुख्यमंत्री दो जगह से चुनाव हारे। तो सवाल यह है: जो नेता खुद अपनी सीट नहीं बचा पाया, वह पूरी पार्टी को कैसे जिताएगा? उत्तराखंड में आज कांग्रेस के जो नेता जनता के बीच जाकर अपनी उपलब्धियां गिना पाते हैं, उसका बड़ा आधार नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री काल में किए गए विकास कार्य हैं। उन्हीं के समय की नीतियां और परियोजनाएं आज भी कांग्रेस की राजनीतिक पूंजी बनी हुई हैं। लेकिन हरीश रावत का नारायणदत्त तिवारी जिसे उत्तराखंड का निर्माता कहा जाता है, को उत्तराखंड विरोधी बताना राज्य के विकास में सलंग्न हजारों लाखों उत्तराखंडियों की भावनाओं पर प्रहार है।
इसके उलट, हरीश रावत द्वारा यह दावा करना कि उन्होंने कांग्रेस को मजबूत किया, वास्तविकता से परे लगता है। उनके राजनीतिक कार्यकाल पर नजर डालें तो बार-बार गुटबाजी की शिकायतें सामने आती रही हैं, जिसने संगठन को मजबूत करने के बजाय कमजोर किया। उनपर आरोप यह भी रहे हैं कि उन्होंने कई मौकों पर अपने ही पार्टी उम्मीदवारों के खिलाफ अपने समर्थकों को सक्रिय किया, खासकर तब जब उम्मीदवार उनकी पसंद के नहीं होते थे। इस तरह की अंदरूनी खींचतान ने न केवल चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित किया, बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल भी गिराया। सबसे गंभीर प्रभाव यह रहा कि इसी गुटबाजी और आंतरिक असंतोष के चलते कांग्रेस के कई जनाधार वाले नेता पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। यह केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं था, बल्कि संगठनात्मक क्षरण का स्पष्ट संकेत भी था। कांग्रेस ने हरीश रावत को सांसद, राज्य सभा, केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री तक
बनाया। कांग्रेस ने रावत को सबकुछ दिया लेकिन रावत ने कांग्रेस को गुटबाजी दी। उत्तराखंड कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या भाजपा नहीं है। उसकी सबसे बड़ी समस्या उसकी अपनी अंदरूनी राजनीति है-जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा संगठन से बड़ी हो जाती है। हरीश रावत के नेतृत्व का एक आकलन किया जा सकता है। जब वह मुख्यमंत्री बने तो उनकी पसंद के और उनके खास तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष किशोर उपाध्याय से उनका राजनैतिक बैर हो गया। उनके नेतृत्व में ही गुटबाजी के कारण एक दर्जन कांग्रेस विधायक कांग्रेस छोडकर भाजपा में
शामिल हो गए। किसी समय उनके खास रहे प्रीतम सिंह जब प्रदेशाध्यक्ष बने तो उनके साथ भी हरीश रावत का राजनैतिक बैर हो गया। प्रीतम के बाद प्रदेशाध्यक्ष बने उनके
सगे रिश्तेदार करन माहरा से भी उनका तालमेल नहीं बना। हरीश रावत की कृपा से प्रदेशाध्यक्ष बने गणेश गोदियाल से भी उनका छत्तीस का आंकडा हो गया। उनके राजनैतिक सलाहकार रहे रणजीत रावत के साथ भी उनका विरोध हो गया। यदि आप कुमायूं क्षेत्र में कांग्रेस की राजनीति का सिंहावलोकन करें तो तीन दर्जन जनाधार वाले ऐसे नेताओं के नाम सामने आएंगे जिनके उभरते नेतृत्व को हरीश रावत के अपनी महत्वाकांक्षाओं के नीचें रौंद दिया। अब बात करें कि हरीश रावत के समय उनके किए गये कार्यों की। उन्होंने कई योजनाएं चलाई जिनमें मेरा गांव, मेरा खेत जैसी धरातली योजनाएं भी शामिल हैं लेकिन उनकी सरकार में जिन योजनाओं पर युद्धस्तर पर काम हुआ उनमें डेनिस शराब योजना, खनन योजना, और नेशनल हाइवे फर्जी मुआवजा योजना शामिल थी। यही नहीं हरीश रावत दो मामलों में जांच से घिरे हैं- एक तो स्टिंग ऑपरेशन की सीबीआई जांच है, जिसमें वो अपनी सरकार बचाने के लिए भ्रष्टाचार करने के लिए आमंत्रण दे रहे हैं। दूसरा नेशनल हाइवे घोटाला है जिसमें 5 करोड़ की एक मनी ट्रांजक्शन उनके अधिकारिक सहयोगी के पास पकड़ी गई है। तो जांच में फंसे हरीश रावत भाजपा के हाथों को खिलौना बने हुए हैं, तभी वह कांग्रेस आघात पहुंचाने के लिए उत्तराखंड के निर्माता राजनीतिज्ञों को राज्य विरोधी बता रहे हैं। अब अगर कांग्रेस को वाकई वापसी करनी है, तो उसे यह तय करना होगा कि वह अतीत के कामों पर राजनीति करेगी या वर्तमान के नेतृत्व पर भरोसा। क्योंकि अभी जो दिख रहा है, वह साफ संकेत देता है, यह लड़ाई जीतने की नहीं, खुद को हराने की बन चुकी है।
(लेखक राजनीतिक समीक्षक एवं दिव्य हिमगिरि के संपादक तथा नारायणदत्त तिवारी के जीवनीकार है)

Previous articleपैरेंट्स का हम पर भरोसा, एक सुखद अनुभूतिः डॉ. पंकज

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here