12 साल में पहली बार संसद में अटकी मोदी सरकार

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    महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में बड़ा झटका लगा, जिसने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। शुक्रवार को हुए मत विभाजन में सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में नाकाम रही। बिल के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े, जबकि इसे पारित कराने के लिए 352 मतों की जरूरत थी। इस तरह सरकार 54 वोटों से पीछे रह गई और विधेयक विचार स्तर पर ही गिर गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने परिणाम की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि आवश्यक समर्थन न मिलने के कारण आगे की प्रक्रिया संभव नहीं है। करीब 21 घंटे तक चली लंबी बहस में 130 सांसदों ने हिस्सा लिया, जिनमें 56 महिला सांसद भी शामिल रहीं जो इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाता है। विपक्ष ने इसे अपनी बड़ी राजनीतिक जीत बताया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मामला नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक ढांचे की लड़ाई थी। इस घटनाक्रम को मोदी सरकार के लिए पिछले 12 वर्षों का सबसे बड़ा संसदीय झटका माना जा रहा है, जिसने आने वाले राजनीतिक समीकरणों को और दिलचस्प बना दिया है।

    महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में बड़ा झटका लगने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। शुक्रवार को सदन में हुए मत विभाजन में यह विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका और विचार स्तर पर ही गिर गया। इस दौरान विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया, लेकिन विधेयक को पारित कराने के लिए 352 मतों की जरूरत थी। इस तरह केंद्र सरकार आवश्यक आंकड़े से 54 वोट पीछे रह गई। परिणाम घोषित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण विधेयक को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। यह घटनाक्रम राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों में यह पहला मौका है जब केंद्र की भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार संसद में कोई अहम विधेयक पारित कराने में विफल रही है। इससे पहले सरकार कई महत्वपूर्ण कानूनों को आसानी से पारित कराती रही है, लेकिन इस बार संख्या बल उसके पक्ष में नहीं दिखा। यह परिणाम न केवल संसद के भीतर बदलते समीकरणों को दर्शाता है, बल्कि विपक्ष की बढ़ती एकजुटता का भी संकेत देता है। विधेयक पर लोकसभा में करीब 21 घंटे तक लंबी और विस्तृत चर्चा हुई। इस दौरान 130 सांसदों ने अपने विचार रखे, जिनमें 56 महिला सांसद भी शामिल थीं। बहस के दौरान पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने तर्क रखे। सरकार ने इसे महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया, जबकि विपक्ष ने इसके प्रावधानों और समयसीमा पर सवाल उठाए। कई विपक्षी नेताओं का कहना था कि विधेयक में व्यावहारिक कमियां हैं और इसे लागू करने के लिए स्पष्ट रोडमैप की जरूरत है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का सवाल नहीं है, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा का मामला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस विधेयक के जरिए राजनीतिक ढांचे में बदलाव करने की कोशिश कर रही है। उनके इस बयान को विपक्षी दलों का व्यापक समर्थन मिला और इसे सरकार के खिलाफ एक मजबूत राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। विपक्षी दलों ने इस परिणाम को अपनी बड़ी जीत बताया है। उनका कहना है कि यह लोकतंत्र की जीत है और सरकार को यह समझना चाहिए कि बिना व्यापक सहमति के ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक पारित नहीं किए जा सकते। कई विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि सरकार को महिलाओं के मुद्दे पर गंभीरता दिखानी चाहिए और केवल राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए।
    वहीं, सरकार की ओर से इस मुद्दे पर फिलहाल संयमित प्रतिक्रिया सामने आई है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और सरकार भविष्य में इस विधेयक को लेकर नई रणनीति के साथ आगे बढ़ेगी। उनका यह भी कहना है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए सरकार प्रतिबद्ध है और इस दिशा में प्रयास जारी रहेंगे। इस पूरे घटनाक्रम ने संसद के भीतर सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। जहां एक ओर सरकार के लिए यह एक बड़ा झटका माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष के लिए यह मनोबल बढ़ाने वाला परिणाम है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस स्थिति से कैसे निपटती है और क्या वह इस विधेयक को दोबारा पेश करने की कोशिश करती है। इस घटना का असर आने वाले चुनावों और राजनीतिक रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सरकार की असफलता विपक्ष को एक मजबूत चुनावी मुद्दा दे सकती है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि संसद में अब किसी भी बड़े विधेयक को पारित कराने के लिए व्यापक सहमति और रणनीतिक तैयारी की जरूरत होगी। इस घटनाक्रम ने यह भी दिखा दिया है कि लोकतंत्र में संख्या बल कितना महत्वपूर्ण होता है। भले ही सरकार के पास बहुमत हो, लेकिन संवैधानिक संशोधन जैसे मामलों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता उसे चुनौतीपूर्ण बना देती है। ऐसे में भविष्य में सरकार को न केवल अपने सहयोगियों को साथ रखना होगा, बल्कि विपक्ष के साथ संवाद और सहमति बनाने पर भी जोर देना होगा। महिला आरक्षण से जुड़े इस विधेयक का लोकसभा में गिरना भारतीय राजनीति के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकता है। यह न केवल सरकार और विपक्ष के बीच शक्ति संतुलन को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि आने वाले समय में संसद के भीतर हर बड़ा फैसला और अधिक विचार-विमर्श और सहमति के आधार पर ही संभव हो पाएगा।

    महिला आरक्षण बिल गिरने पर सत्ता पक्ष का विपक्ष पर हमला

    लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक के गिरने के बाद देश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। सत्ता पक्ष ने जहां विपक्ष पर महिलाओं के अधिकारों से खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है, वहीं विपक्ष इसे सरकार की राजनीतिक रणनीति बता रहा है। इस बीच, बिल के गिरने के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की महिला सांसदों ने संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन भी किया, जिससे यह मुद्दा और ज्यादा गरमा गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सदन में “अजीब नजारा” देखने को मिला, जहां विपक्षी दलों ने एकजुट होकर इस विधेयक को पास नहीं होने दिया। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि इस पर जीत का जश्न मनाना निंदनीय है। शाह ने कहा कि इस बिल के गिरने से देश की महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का वह अधिकार नहीं मिल पाएगा, जिसकी लंबे समय से मांग की जा रही थी। अमित शाह ने कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने महिलाओं से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों का विरोध किया हो, बल्कि वे पहले भी ऐसे कदम उठा चुके हैं। उन्होंने कहा, “उनकी सोच न महिलाओं के हित में है और न ही देश के हित में।” शाह ने आगे चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यह नारी शक्ति का अपमान है और इसका असर दूर तक जाएगा। उनके मुताबिक, विपक्ष को आने वाले चुनावों में महिलाओं के गुस्से का सामना करना पड़ेगा, खासकर 2029 के आम चुनावों में। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने भी विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा कि अगर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल महिलाओं को उनका अधिकार न मिलने पर जश्न मना रहे हैं, तो इससे ज्यादा दुखद कुछ नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि सरकार महिलाओं को उनका अधिकार देने के लिए प्रतिबद्ध थी, लेकिन विपक्ष की वजह से यह संभव नहीं हो पाया। सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री ने खुद विपक्ष को इस विधेयक पर सहयोग के लिए खुला प्रस्ताव दिया था। उन्होंने यहां तक कहा था कि उन्हें इस पर राजनीतिक श्रेय (क्रेडिट) नहीं चाहिए और यदि बिल पारित हो जाता है तो वह सभी दलों को धन्यवाद देने के लिए तैयार हैं। “क्रेडिट का ब्लैंक चेक” देने की बात भी कही गई थी, लेकिन इसके बावजूद विपक्ष ने साथ नहीं दिया। दूसरी ओर, बिल के गिरने के बाद भाजपा और एनडीए की महिला सांसदों ने संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि यह केवल एक विधेयक नहीं, बल्कि देश की करोड़ों महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। महिला सांसदों ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि उसने राजनीतिक कारणों से महिलाओं के हितों की अनदेखी की है। महिला आरक्षण विधेयक को लेकर संसद के भीतर सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव को और गहरा कर दिया है। जहां एक ओर सत्ता पक्ष इसे महिलाओं के अधिकारों पर हमला बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे सरकार की राजनीतिक चाल करार दे रहा है। साफ है कि महिला आरक्षण बिल का मुद्दा अब केवल विधायी बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह देश की राजनीति का बड़ा केंद्र बिंदु बन चुका है, जिसका असर आने वाले समय में और अधिक देखने को मिल सकता है।

    परिसीमन पर विपक्ष का तीखा विरोध, “यह महिलाओं का नहीं, सत्ता बचाने का बिल था”

    लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक के गिरने के बाद देश की राजनीति में घमासान तेज हो गया है। जहां एक ओर केंद्र सरकार इस विधेयक को महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही थी, वहीं विपक्ष ने इसे “परिसीमन के जरिए सत्ता में बने रहने की रणनीति” करार देते हुए जोरदार विरोध किया। शुक्रवार को हुए मत विभाजन में सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सकी और बिल 54 वोट से गिर गया। इसके साथ ही संसद में सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है। विपक्ष ने स्पष्ट किया है कि उसका विरोध महिला आरक्षण से नहीं, बल्कि उससे जुड़े अन्य प्रावधानों से था। खासतौर पर परिसीमन बिल को लेकर विपक्ष ने दो बड़े मुद्दे उठाए। पहला, इससे दक्षिण भारत के राज्यों की संसद में राजनीतिक ताकत कम हो सकती है, और दूसरा, यह ओबीसी तथा एससी-एसटी वर्ग के हितों के खिलाफ माना गया। विपक्षी दलों का कहना है कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को बिना व्यापक सहमति के लागू करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि संविधान और देश की राजनीतिक संरचना को बदलने की कोशिश है। उन्होंने कहा, “हमने संविधान पर हुए इस हमले को हरा दिया है। हमने साफ तौर पर कहा है कि यह महिला आरक्षण बिल नहीं है, बल्कि यह भारत की राजनीतिक संरचना को बदलने का एक तरीका है।” उनके इस बयान को विपक्षी दलों का व्यापक समर्थन मिला और इसे सरकार के खिलाफ मजबूत राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने शनिवार को कहा कि लोकसभा में जो कुछ हुआ, वह लोकतंत्र की बड़ी जीत है। उनके मुताबिक, सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन के जरिए सत्ता में बने रहने की साजिश कर रही थी। उन्होंने कहा, “मैं बहुत खुश हूं कि लोकसभा में सीटें बढ़ाने के लिए लाया गया बिल गिर गया। सत्ता पक्ष हमें महिला विरोधी कहकर खुद को मसीहा नहीं बना सकता।” प्रियंका गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री के भाषणों में यह संकेत दिया जा रहा था कि जो इस बिल से सहमत नहीं होगा, वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने के योग्य नहीं है। उन्होंने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि इससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। उनके अनुसार, पूरी रणनीति इस तरह बनाई गई थी कि परिसीमन को महिलाओं के नाम पर लागू किया जाए, ताकि सत्ता में बने रहने का रास्ता आसान हो सके। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने यह सोचकर बिल पेश किया था कि अगर यह पास हो जाता है तो उसकी बड़ी जीत होगी, और अगर नहीं होता है तो विपक्ष को महिला विरोधी बताकर राजनीतिक लाभ उठाया जाएगा। प्रियंका गांधी ने कहा, “यह साफ है कि यह महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि परिसीमन के लिए लाया गया था। मैं खुश हूं कि विपक्ष ने इसका विरोध किया। यह सरकार के लिए ब्लैक डे है, क्योंकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि बिल इस तरह गिर जाएगा।” इस विधेयक के तहत संसद की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था, जो सीधे तौर पर परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि विपक्ष ने इसे केवल महिला आरक्षण का मुद्दा मानने से इनकार कर दिया और इसे व्यापक राजनीतिक बदलाव की रणनीति बताया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, हम महिलाओं के विरोधी नहीं हैं, और हम लंबे समय से महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। हमने 2023 के संशोधन का सर्वसम्मति से समर्थन किया और उसे पास किया। हालाँकि, उसकी आड़ में उन्होंने एक और संशोधन पेश किया, जिसमें उन्होंने परिसीमन का एक क्लॉज डाल दिया, जिससे महिलाओं के आरक्षण और परिसीमन बिल एक साथ जुड़ गए। इन तीनों बिलों को एक साथ लाकर, वे सत्ता हासिल करना चाहते थे ताकि सदन में किसी भी आगे के परिसीमन कानून को साधारण बहुमत से पास किया जा सके और बदला जा सके। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने कहा, हमने 2023 का महिला आरक्षण अधिनियम पहले ही सर्वसम्मति से पास कर दिया था। अब सरकार को 2029 के चुनावों के लिए इस विधेयक को लागू करने के लिए तुरंत कदम उठाने होंगे। महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने का उनका एजेंडा कल फेल हो गया क्योंकि वे अपनी सुविधा के हिसाब से परिसीमन करना चाहते हैं। वहीं सपा सांसद डिंपल यादव ने कहा, ये लोग समाज को बांटने वाले हैं। इन्होंने हमेशा समाज में फूट, अविश्वास और डर पैदा किया है और इसी हथियार के दम पर ये सत्ता में बने रहे हैं। अब लोग इनकी इस चाल को समझ चुके हैं। महिला आरक्षण संशोधन बिल का लोकसभा में गिरना केवल एक विधायी घटना नहीं है, बल्कि यह सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ती राजनीतिक खींचतान का प्रतीक बन गया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाने की संभावना है, और इसका असर देश की राजनीति के साथ-साथ चुनावी रणनीतियों पर भी साफ तौर पर देखने को मिल सकता है।

    मतदान से पहले ही आधी रात का नोटिफिकेशन बना विवाद की जड़

    महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक पर लोकसभा में मतदान से पहले ही केंद्र सरकार द्वारा आधी रात को जारी किया गया नोटिफिकेशन अब नए राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है। विपक्ष ने इस कदम को “जल्दबाजी” और “पूर्वनियोजित रणनीति” करार देते हुए सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सरकार ने बिल को संसद में पारित कराने से पहले ही उससे संबंधित प्रावधानों को लेकर अधिसूचना जारी कर दी थी। विपक्षी दलों का कहना है कि जब तक कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित होकर कानून का रूप नहीं ले लेता, तब तक इस तरह की कार्रवाई लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत मानी जाती है। उनका आरोप है कि सरकार को पहले ही भरोसा था कि बिल पास हो जाएगा, इसलिए उसने प्रक्रिया से पहले ही प्रशासनिक कदम उठा लिए। विपक्ष के कई नेताओं ने इसे संसद की गरिमा के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार संसदीय चर्चा और मत विभाजन को केवल औपचारिकता मान रही थी। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पार्टी समेत कई दलों ने कड़ा विरोध जताया है और इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चिंताजनक बताया है। वहीं, सरकार की ओर से इस पर अभी तक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह कदम केवल प्रशासनिक तैयारी के तहत उठाया गया था। हालांकि, बिल के लोकसभा में गिरने के बाद यह नोटिफिकेशन और ज्यादा सवालों के घेरे में आ गया है, जिससे राजनीतिक माहौल और गर्मा गया है।

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