इक्कीसवीं सदी का यह दौर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और तकनीकी आपूर्ति शृंकखलाओं की वैश्विक प्रतिस्पर्धा का दौर बन चुका है। ऐसे समय में भारत द्वारा एआई शिखर सम्मेलन का सफल आयोजन और उसके तुरंत बाद अमेरिका के नेतृत्व वाले समूह पैक्स सिलिका से औपचारिक रूप से जुड़ना केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी और रणनीतिक कदम है। यह उस नए भारत की घोषणा है जो तकनीकी शक्ति, नैतिक दृष्टि और वैश्विक संतुलन-तीनों को साथ लेकर चलने का सामर्थ्य अर्जित कर रहा है। एआई समिट के माध्यम से भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह अब केवल तकनीक का उपभोक्ता राष्ट्र नहीं, बल्कि निर्माता और मार्गदर्शक की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। दुनिया की तीसरी बड़ी एआई शक्ति बनने की दिशा में यह एक ठोस चरणन्यास है।
दुर्लभ खनिजों और सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला पर चीन का लगभग 90 प्रतिशत वर्चस्व पिछले कुछ वर्षों से वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। कंप्यूटर चिप से लेकर रक्षा प्रणालियों और अंतरिक्ष तकनीक तक, हर क्षेत्र इन संसाधनों पर निर्भर है। इस पृष्ठभूमि में पैक्स सिलिका जैसे मंच की परिकल्पना एक संतुलित, विश्वसनीय और बहु-धु्रवीय तकनीकी ढांचे के रूप में की गई है। भारत का इस समूह में शामिल होना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं, बल्कि रणनीतिक और अनिवार्य निर्णय है। भारत की इंजीनियरिंग क्षमता, विशाल युवा प्रतिभा और उभरता हुआ सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम इस गठबंधन को नई मजबूती प्रदान करेगा। यह पहल किसी के विरुद्ध आक्रामकता नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में संतुलन और विविधता स्थापित करने का प्रयास है। जब शक्ति का केंद्रीकरण टूटता है और साझेदारी का विस्तार होता है, तभी विश्व व्यवस्था स्थिर और संतुलित बनती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारत ने तकनीक को शासन और विकास के केंद्र में स्थापित किया है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और सेमीकंडक्टर मिशन जैसी पहलों ने एक मजबूत आधार तैयार किया है। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर आज दुनिया के लिए एक मॉडल बन चुका है। आधार, यूपीआई और डिजिटल सेवाओं ने करोड़ों लोगों को आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ा है। इसी आधार पर एआई और चिप निर्माण के क्षेत्र में महत्वाकांक्षी कदम उठाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री की सक्रियता और वैश्विक मंचों पर भारत की प्रभावी उपस्थिति ने देश को एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित किया है। उनका दृष्टिकोण केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता को वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ने का है।

भारत में चिप डिजाइन, निर्माण और एआई अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए बड़े निवेश आकर्षित किए जा रहे हैं। वैश्विक कंपनियाँ भारत को स्थिर लोकतंत्र, कुशल मानव संसाधन और दीर्घकालिक नीति स्थिरता वाले देश के रूप में देख रही हैं। पैक्स सिलिका जैसे अंतरराष्ट्रीय ढांचे का हिस्सा बनने से भारत को तकनीकी सहयोग, संयुक्त अनुसंधान, पूंजी निवेश और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण में व्यापक लाभ मिलेगा। इससे न केवल चीन पर निर्भरता कम होगी, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता भी सुदृढ़ होगी। यह भागीदारी भारत को अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों जैसी प्रमुख तकनीकी शक्तियों के साथ और अधिक निकटता से जोड़ेगी, जिससे वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में भारत की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ेगी। भारत की विशेषता केवल तकनीकी क्षमता नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टि भी है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से प्रेरित भारत एआई को मानव-केंद्रित विकास का माध्यम बनाना चाहता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में एआई के उपयोग से व्यापक जनकल्याण सुनिश्चित किया जा सकता है। यदि तकनीक कुछ शक्तियों के हाथों में सिमट जाए तो असंतुलन बढ़ता है, किंतु जब लोकतांत्रिक और समावेशी राष्ट्र इसका नेतृत्व करते हैं तो यह वैश्विक कल्याण का साधन बन सकती है। भारत का प्रयास है कि एआई के नैतिक मानदंड सार्वभौमिक हों और तकनीक का उपयोग हथियार के रूप में नहीं, बल्कि मानव प्रगति के साधन के रूप में हो।
भारत की दृष्टि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी प्रगति का उपकरण नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के विस्तार का माध्यम है। जिस देश ने विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का मंत्र दिया, जिसने करुणा, अहिंसा और सह-अस्तित्व की परंपरा को जीवन-मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया, वह एआई को भी केवल बाज़ार और प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि मानव कल्याण और वैश्विक संतुलन के संदर्भ में देखता है। भारत की सभ्यता-चेतना, जो महात्मा गांधी की अहिंसा और गौतम बुद्ध की करुणा से अनुप्राणित है, तकनीकी विकास को नैतिक अनुशासन से जोड़ने की प्रेरणा देती है। यहाँ विकास का अर्थ केवल गति नहीं, बल्कि दिशा भी है; केवल क्षमता नहीं, बल्कि संवेदना भी है। यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जीवन की समग्रता-प्रकृति, समाज और मानव गरिमा के साथ जोड़ा जाए, तो भारत विश्व संरचना में ऐसा संतुलित मॉडल प्रस्तुत कर सकता है जो तकनीक को विनाश का कारण बनने से रोककर उसे सृजन, समावेशन और मानव उत्कर्ष का सशक्त साधन बना दे।
आज दुनिया दो धु्रवों के बीच खड़ी दिखाई देती है-एक ओर केंद्रीकृत तकनीकी वर्चस्व, दूसरी ओर साझेदारी और संतुलन का मॉडल। भारत का उभार इस द्वंद्व को संतुलन में बदलने की क्षमता रखता है। भारत न टकराव की राह पर है, न निष्क्रियता कीय वह सक्रिय संतुलन की नीति अपना रहा है। यह संतुलन ही भविष्य की शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था का आधार बन सकता है। पैक्स सिलिका के माध्यम से भारत और उसके सहयोगी एक ऐसी नई दिशा दे सकते हैं जहाँ तकनीकी नवाचार का लाभ वैश्विक दक्षिण तक पहुँचे, आपूर्ति श्रृंखला पारदर्शी हो और वैश्विक शक्ति-संतुलन स्थिर रहे। निस्संदेह, यह समय भारत के लिए ऐतिहासिक है। एआई और सेमीकंडक्टर के इस युग में भारत का यह कदम उसकी आर्थिक और तकनीकी शक्ति को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उभरती यह तकनीकी और एआई क्रांति न केवल भारत को सशक्त बना रही है, बल्कि विश्व को भी संतुलन और सहयोग की नई राह दिखा रही है। आने वाले वर्षों में यह साझेदारी नई सृष्टि का आधार बन सकती है-एक ऐसी सृष्टि जहाँ तकनीक प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि समन्वय और शांति का माध्यम बने। भारत इस दिशा में दृढ़ता से अग्रसर है और विश्व नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए स्वयं को सक्षम बना रहा है।





