घर-घर की पूजा-अर्चना, मंदिरों की आरती और ध्यान-साधना की परंपरा से जुड़ी अगरबत्तियों की खुशबू अब आस्था के साथ-साथ सेहत के लिए भी सुरक्षित होगी। लंबे समय से अगरबत्ती के धुएं में मौजूद हानिकारक रसायनों को लेकर उठ रही चिंताओं पर केंद्र सरकार ने निर्णायक कदम उठाया है। राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के अवसर पर केंद्रीय उपभोक्ता मंत्री प्रल्हाद जोशी ने अगरबत्ती निर्माण के लिए नया राष्ट्रीय मानक जारी किया है, जिसके तहत अब ऐसे रसायनों के इस्तेमाल पर रोक लगेगी जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह माने जाते हैं। इस पहल का उद्देश्य पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की शुद्धता सुनिश्चित करना, उपभोक्ताओं की सेहत की रक्षा करना और देश के पारंपरिक अगरबत्ती उद्योग को भरोसे और गुणवत्ता के नए मानकों से जोड़ना है। नया मानक न केवल आम लोगों को सुरक्षित विकल्प उपलब्ध कराएगा, बल्कि भारत को वैश्विक बाजार में और मजबूत स्थिति भी दिलाएगा दिव्य हिमगिरि रिपोर्ट।
घर-घर में होने वाली पूजा-अर्चना, मंदिरों की आरती और ध्यान-साधना की परंपरा में अगरबत्ती की खुशबू का विशेष महत्व रहा है। आस्था, पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाने वाली अगरबत्तियां अब न केवल धार्मिक भावनाओं को सुकून देंगी, बल्कि लोगों की सेहत के लिए भी सुरक्षित होंगी। लंबे समय से अगरबत्ती के धुएं में मौजूद हानिकारक रसायनों को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच केंद्र सरकार ने एक अहम और दूरगामी कदम उठाया है। राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के अवसर पर केंद्रीय उपभोक्ता मंत्री प्रल्हाद जोशी ने अगरबत्ती निर्माण के लिए नया भारतीय मानक जारी किया है, जिसे आईएस-19412:2025 नाम दिया गया है। इस मानक के लागू होने से अब अगरबत्तियां आस्था के साथ-साथ स्वास्थ्य और पर्यावरण के अनुकूल भी होंगी। भारत दुनिया का सबसे बड़ा अगरबत्ती उत्पादक और निर्यातक देश है। देश में करीब आठ हजार करोड़ रुपये का यह उद्योग लाखों कारीगरों, महिलाओं और छोटे उद्यमियों को रोजगार देता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में यह उद्योग आजीविका का एक मजबूत आधार माना जाता है। ऐसे में अगरबत्ती निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर उठाए गए कदम न केवल उपभोक्ताओं के हित में हैं, बल्कि उद्योग को भी नई मजबूती देने वाले हैं। सरकार का मानना है कि नए मानक से अगरबत्तियों की विश्वसनीयता बढ़ेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों की मांग और साख मजबूत होगी। यह नया मानक भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा तैयार किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य अगरबत्ती निर्माण प्रक्रिया को शुद्ध, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल बनाना है। सनातन परंपरा में अगरबत्ती को शुद्धता, सकारात्मक ऊर्जा और वातावरण को पवित्र करने का साधन माना गया है। ऐसे में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं में यदि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रसायनों की मिलावट हो, तो यह न केवल उपभोक्ताओं के साथ अन्याय है, बल्कि आस्था के मूल भाव के भी खिलाफ है। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अगरबत्ती के लिए सख्त और स्पष्ट मानक तय किए हैं। नए मानक के तहत बीआइएस का मानक चिह्न अगरबत्तियों पर भरोसे की पहचान बनेगा। इससे उपभोक्ताओं को यह भरोसा मिलेगा कि जिस अगरबत्ती का उपयोग वे पूजा या साधना में कर रहे हैं, उसकी खुशबू सेहत पर भारी नहीं पड़ेगी। पिछले कुछ वर्षों में देश और विदेश में हुए कई अध्ययनों में यह बात सामने आई थी कि कुछ अगरबत्तियों में कृत्रिम रसायन और कीटनाशक मिलाए जा रहे हैं। इन रसायनों से निकलने वाला धुआं सांस के जरिये शरीर में प्रवेश कर एलर्जी, आंखों में जलन, सिरदर्द, सांस की तकलीफ और अन्य गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। खासकर बंद कमरों में लंबे समय तक अगरबत्ती जलाने से इनडोर हवा की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है। लगातार दूषित हवा के संपर्क में रहने से बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को अधिक खतरा रहता है। इन्हीं कारणों से यूरोप समेत कई देशों में सुगंधित उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायनों पर पहले ही सख्त पाबंदियां लगाई जा चुकी हैं। अब भारत में भी इन्हीं वैश्विक अनुभवों और वैज्ञानिक निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए अगरबत्ती निर्माण में खतरनाक रसायनों पर रोक लगाई गई है। नए मानक के तहत अगरबत्ती बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल, खुशबू, जलने की गुणवत्ता और शुद्धता से जुड़े स्पष्ट नियम तय किए गए हैं। मशीन से बनी, हाथ से बनी और पारंपरिक मसाला अगरबत्तियों—तीनों श्रेणियों के लिए अलग-अलग दिशानिर्देश बनाए गए हैं, ताकि हर प्रकार की अगरबत्ती सुरक्षित और मानक के अनुरूप हो। इससे न केवल उपभोक्ताओं को बेहतर उत्पाद मिलेगा, बल्कि कारीगरों और निर्माताओं को भी गुणवत्ता सुधारने का अवसर मिलेगा। इस मानक के सबसे अहम पहलुओं में हानिकारक रसायनों पर पूरी तरह प्रतिबंध शामिल है। अब अगरबत्ती निर्माण में उन रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा, जो अब तक स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा बने हुए थे। इनमें मुख्य रूप से कीड़े मारने की दवाएं शामिल हैं, जिनका धुआं सांस के जरिये शरीर में जाकर कई बार सिगरेट से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से फेफड़ों पर गंभीर असर पड़ सकता है। प्रतिबंधित किए गए रसायनों में एलेथ्रिन, पर्मेथ्रिन, सायपरमेथ्रिन, डेल्टामेथ्रिन और फिप्रोनिल जैसे तत्व शामिल हैं। ये रसायन तेज और लंबे समय तक टिकने वाली खुशबू के लिए इस्तेमाल किए जाते थे, लेकिन इनके दुष्प्रभाव अब सामने आ चुके हैं। इसके अलावा सायनाइड, एथिल एक्रिलेट और डाइफेनाइलअमाइन जैसे रसायनों के धुएं से सिरदर्द, एलर्जी और सांस संबंधी समस्याएं होने की आशंका रहती है। नए मानक के तहत इन सभी पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि इस पहल का मकसद केवल उद्योग को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि आस्था की रक्षा के साथ-साथ आम लोगों की सेहत को सुरक्षित करना है। शास्त्रों और परंपराओं में भी पूजा के लिए शुद्ध सामग्री के उपयोग पर जोर दिया गया है। अगरबत्ती का मूल उद्देश्य वातावरण को पवित्र और सकारात्मक बनाना है, न कि उसे प्रदूषित करना। नया भारतीय मानक इसी भावना के अनुरूप तैयार किया गया है, ताकि पूजा-पाठ और साधना का अनुभव सुरक्षित, सुकून देने वाला और स्वास्थ्य के अनुकूल बने। अगरबत्ती के लिए जारी किया गया यह नया राष्ट्रीय मानक आस्था और विज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे जहां एक ओर उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ेगा, वहीं दूसरी ओर भारतीय अगरबत्ती उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई पहचान और मजबूती मिलेगी। आने वाले समय में यह मानक न केवल लोगों की सेहत की रक्षा करेगा, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच एक मजबूत सेतु भी बनेगा।






