सत्य, अहिंसा और वैश्विक शांति के लिए एक नया दृष्टिकोण

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हर साल 30 जनवरी को शहीद दिवस (Shaheed Diwas) महात्मा गांधी के जीवन और बलिदान की याद में मनाया जाता है । आज की तेजी से बदलती दुनिया में, जहाँ जलवायु परिवर्तन और गहरी असमानताएं वैश्विक उत्तर (Global North) और दक्षिण (Global South) के जीवन को प्रभावित कर रही हैं, गांधीजी के सत्य और अहिंसा के दर्शन को एक नए संदर्भ में देखने की आवश्यकता है ।

सत्य और अहिंसा: ऐतिहासिक जड़ें और वैश्विक ढांचा गांधीजी का मूल विचार सरल था: “सत्यमेव जयते” (केवल सत्य की जीत होती है) । उनके लिए अहिंसा केवल हिंसा की अनुपस्थिति नहीं थी, बल्कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध के माध्यम से सत्य और न्याय की सक्रिय खोज थी । इसके विपरीत, वैश्विक उत्तर के देश अक्सर शांति को एक नैतिक अनिवार्यता के बजाय केवल अपनी विदेश नीति के रणनीतिक लक्ष्य के रूप में देखते हैं ।

वैश्विक उत्तर बनाम दक्षिण: शांति के विभिन्न अनुभव सत्य और सुलह (Reconciliation) की अवधारणा भौगोलिक स्थितियों के अनुसार बदल जाती है:

• वैश्विक उत्तर: यहाँ संस्थान (जैसे WHO, UN) अक्सर तकनीकी और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देते हैं।

• वैश्विक दक्षिण: यहाँ शांति और सत्य का अनुभव उपनिवेशवाद और शोषण की ऐतिहासिक विरासतों से प्रभावित है । दक्षिण अफ्रीका और कोलंबिया जैसे देशों में सुलह की प्रक्रियाएं केवल कानूनी प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सामुदायिक उपचार और जवाबदेही पर जोर देती हैं।

पर्यावरण और नैतिक जिम्मेदारी आज जलवायु परिवर्तन इस नैतिक परीक्षा का सबसे बड़ा उदाहरण है । गांधीजी ने कहा था, “पृथ्वी हर मनुष्य की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है, लेकिन हर मनुष्य के लालच को नहीं”। जलवायु कार्रवाई अब केवल एक तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक अनिवार्यता है । हमें “अहिंसा” के सिद्धांत को अब पृथ्वी तक विस्तारित करना होगा—यानी प्रकृति के प्रति अहिंसा और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जवाबदेही।

निष्कर्ष: एक साझा भविष्य की ओर शहीद दिवस पर गांधीजी के बलिदान को याद करते हुए, हमें जलवायु न्याय, समानता और सीमाओं से परे शांति के संघर्ष को जोड़ना होगा । सुलह की इस प्रक्रिया में “पारिस्थितिक सुलह” को शामिल करना अनिवार्य है, ताकि मनुष्य और धरती के बीच के टूटते रिश्तों को फिर से जोड़ा जा सके।

अल्लामा इक़बाल ने मानवता को जोड़ने का जो संदेश दिया था, वह आज के इस वैश्विक संकट में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है: “शक्ति भी शान्ति भी भगतों के गीत में है, धरती के वासियों की मुक्ति प्रीत में है।” इसी सच्चाई और आपसी प्रेम को पहचान कर ही हम उत्तर और दक्षिण की खाई को पाट सकते हैं और मानवता व प्रकृति के बीच एक नया संतुलन बना सकते हैं। इसी पहचान में वह साझा सत्य छिपा है जो हमें और इस जीवित संसार को एक सूत्र में बांध सकता है।

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