देशभक्ति की पवित्र गूंज के 150 वर्ष

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देशभक्ति की उस पवित्र गूंज को 150 वर्ष पूरे हो गए, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को दिशा दी। “वंदे मातरम” यह गीत केवल स्वर नहीं, वह भावना है जिसने हर भारतीय के हृदय में मातृभूमि के प्रति प्रेम, समर्पण और त्याग की ज्वाला प्रज्वलित की। इसकी प्रत्येक पंक्ति में भारत मां की ममता, वीरता और गौरव का सार है। वंदे मातरम ने न केवल आजादी के दीवानों को प्रेरित किया, बल्कि पीढ़ियों को यह स्मरण दिलाया कि राष्ट्रभक्ति केवल शब्द नहीं, यह जीवन का उद्देश्य है। यह 150वां वर्ष हमें यह भी याद दिलाता है कि जब तक वंदे मातरम की गूंज हमारे कंठों में है, तब तक भारत की आत्मा जीवित है और अखंड राष्ट्रभाव अमर रहेगा। राजधानी दिल्ली में इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष स्मारक डाक टिकट और स्मृति सिक्का जारी किया। दिव्य हिमगिरि रिपोर्ट

भारत के इतिहास में कुछ शब्द ऐसे हैं जो केवल बोले नहीं जाते, बल्कि आत्मा में उतर जाते हैं। “वंदे मातरम” ऐसा ही एक मंत्र है । जिसने गुलामी के अंधकार में डूबे देश को जागृत किया, उसे एकता, साहस और स्वाभिमान का संबल दिया। इस वर्ष राष्ट्र इस गीत की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है, जो भारत के सांस्कृतिक और स्वतंत्रता संघर्ष की आत्मा बन चुका है। 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंदमठ में वंदे मातरम की रचना की थी। यह गीत केवल साहित्य नहीं था । यह एक पुकार थी, एक भाव था जो मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम से उपजा। अंग्रेजी शासन के दमन के बीच जब भी भारतीयों ने यह गीत गाया, तो उनके भीतर एक नया जोश भर गया। आजादी के आंदोलनों से लेकर सभाओं और सत्याग्रहों तक, वंदे मातरम स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया। समय बदलता गया, पर वंदे मातरम का स्वर नहीं बदला। इसने 1947 में स्वतंत्र भारत का सूर्योदय देखा और अब 2025 में अपने 150 गौरवशाली वर्ष पूरे किए हैं। यह केवल एक गीत की वर्षगांठ नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा की अमरता का उत्सव है। यह भारत की मिट्टी की सुगंध, खेतों की हरियाली, पर्वतों की दृढ़ता और मां की ममता का प्रतीक है। इस ऐतिहासिक अवसर पर राजधानी दिल्ली में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एक स्मारक डाक टिकट और स्मृति सिक्का जारी किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि वंदे मातरम केवल गीत नहीं, यह भारत की आत्मा की आवाज है, जिसने हर युग में देशभक्ति की लौ को जीवित रखा। आज जब देश तकनीक और प्रगति के नए युग में प्रवेश कर चुका है, तब भी वंदे मातरम की पंक्तियां हमें याद दिलाती हैं कि राष्ट्रप्रेम कोई बीती बात नहीं, बल्कि हर भारतीय के जीवन का आधार है। यह गीत हमारे पूर्वजों की तपस्या और बलिदान की गूंज है। यह हमें जोड़ता है। भाषा, धर्म, प्रांत की सीमाओं से परे एक ही ध्वनि में मां, मैं तेरे चरणों में नमन करता हूं। 150 वर्षों के इस सफर में वंदे मातरम ने भारत को भावनाओं के धागों से बांधा है। यह गीत हर स्वतंत्रता सेनानी की आँखों में चमक, हर नागरिक के हृदय में गर्व और हर युवा के स्वप्न में प्रेरणा बनकर जीवित है। यह भारत की आत्मा का गीत है, जो हमें याद दिलाता है । जब तक वंदे मातरम गूंजता रहेगा, तब तक भारत केवल भूमि नहीं, भावनाओं का जीवंत राष्ट्र रहेगा। राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जारी विशेष डाक टिकट और स्मृति सिक्का इस अमर गीत को नमन है । उस मातृभूमि को प्रणाम है जिसने हमें वंदे मातरम जैसा अनंत आशीर्वाद दिया। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर देशभर में भव्य उत्सव मनाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजधानी दिल्ली में आयोजित समारोह में कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, यह मां भारती की आराधना, एक मंत्र, एक ऊर्जा और एक संकल्प है। उन्होंने इस अवसर पर विशेष स्मारक डाक टिकट और स्मृति सिक्का भी जारी किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह गीत भारत के इतिहास को जोड़ता है, वर्तमान को आत्मविश्वास से भरता है और भविष्य को नई प्रेरणा देता है। वहीं गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि वंदे मातरम यह सिद्ध करता है कि भारत केवल भूभाग नहीं, बल्कि एक विचार है। उन्होंने सभी नागरिकों से स्वदेशी अपनाने और 2047 तक उस महान भारत के निर्माण का संकल्प लेने का आह्वान किया जिसका सपना स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संदेश में कहा कि वंदे मातरम वह पवित्र स्वर है जिसने भारत को एकता, वीरता और समर्पण की शक्ति दी। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा की भावना के साथ इस गीत की भावना को अपने जीवन में उतारें। वहीं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि वंदे मातरम भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति है, जिसने गुलामी की जंजीरों में बंधे देश को आत्मबल और स्वतंत्रता का विश्वास दिया। उन्होंने कहा कि आज जब देश अमृतकाल की यात्रा पर है, तब इस गीत के 150 वर्ष पूरे होना यह संदेश देता है कि भारत की आत्मा सदैव अजर और अमर रहेगी।

राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम ने अंग्रेज साम्राज्य की हिला दी नींव

भारत की आजादी से पहले जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब एक गीत ने पूरे राष्ट्र में स्वतंत्रता की अलख जगा दी । वंदे मातरम। यह गीत केवल साहित्यिक रचना नहीं था, यह भारत की आत्मा की आवाज़ बन गया। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित और 1882 में उनके उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित वंदे मातरम वह पहली पुकार थी जिसने भारतीय जनमानस को एकता के सूत्र में बांधा और स्वतंत्रता का सपना दिखाया। जब बंकिमचंद्र ने यह गीत लिखा, तब भारत में निराशा, दमन और असहायता का वातावरण था। अंग्रेजों के शासन में भारतीयों को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता था। ऐसे समय में वंदे मातरम ने लोगों को आत्मसम्मान और स्वाभिमान का एहसास कराया। जब पहली बार यह गीत कांग्रेस के 1896 के अधिवेशन में गाया गया, तो पूरे पंडाल में जोश और भावनाओं की लहर दौड़ गई। इसके बाद यह गीत हर सभा, जुलूस और स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बन गया। वंदे मातरम ब्रिटिश शासन के लिए सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि विद्रोह की ध्वनि बन गया। जब भी यह गीत सड़कों पर गूंजता, अंग्रेज़ अफसरों के माथे पर शिकन आ जाती। बंगाल विभाजन (1905) के समय यह गीत स्वदेशी आंदोलन का युद्धघोष बन गया था। अंग्रेज सरकार ने इसकी लोकप्रियता से भयभीत होकर इसे सार्वजनिक रूप से गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। कई जगह आंदोलनकारियों को केवल वंदे मातरम बोलने पर गिरफ्तार कर लिया गया। परंतु प्रतिबंध जितना बढ़ता गया, यह गीत उतनी ही तेजी से जनमानस में गूंजता गया।
भगत सिंह, अरविंद घोष, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों ने वंदे मातरम को अपनी प्रेरणा बनाया। जेल की कोठरियों में, सभाओं में, सत्याग्रहों में और विदेशी वस्त्रों की होली में। हर जगह यह गीत गूंजता था। यह वह मंत्र था जिसने देश के कोने-कोने में स्वतंत्रता की ज्वाला भड़का दी। ब्रिटिश शासन इस गीत से इतना भयभीत हो गया कि कई सरकारी स्कूलों और संस्थानों में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। लेकिन इसके बावजूद, यह गीत भूमिगत सभाओं और आंदोलनों में गाया जाता रहा। यह प्रतिबंध वंदे मातरम की लोकप्रियता को और बढ़ाता गया, और यह स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता प्राप्त कर गया। आज भी जब वंदे मातरम की ध्वनि गूंजती है, तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि उस युग की स्मृति है जिसने भारत को आजादी का मार्ग दिखाया। अंग्रेजों ने इसे दबाने की कोशिश की, पर वे इस गीत में छिपी मातृभूमि की शक्ति को कभी परास्त नहीं कर सके। वंदे मातरम ने भारत को यह विश्वास दिया कि जब तक यह मंत्र गूंजता रहेगा, तब तक भारत की आत्मा को कोई भी शक्ति पराजित नहीं कर सकती।

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