महिला आरक्षण के मुद्दे ने उत्तराखंड में सियासत और जनआंदोलन, दोनों को एक साथ गर्मा दिया है। एक ओर राजधानी देहरादून की सड़कों पर निकले महिला मशाल जुलूस में महिलाओं का आक्रोश और अधिकारों की मांग साफ नजर आई, तो दूसरी ओर विधानसभा के विशेष सत्र में इस विषय पर तीखी बहस ने राजनीतिक माहौल को और तेज कर दिया। सत्र के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में मजबूती से पक्ष रखते हुए कहा कि महिलाओं को उनका पूरा अधिकार दिलाना सरकार की प्राथमिकता है और इसके लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने सभी दलों से अपील की कि इस मुद्दे पर राजनीति न की जाए। वहीं विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि महिला आरक्षण को लेकर केवल राजनीतिक माहौल बनाया जा रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर ठोस कदमों की कमी है। दिव्य हिमगिरि रिपोर्ट।
देश में महिला आरक्षण को लेकर सियासी माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में इस मुद्दे को लेकर विपक्ष के खिलाफ राजनीतिक अभियान तेज कर दिया गया है। उत्तराखंड में भी इस बहस ने जोर पकड़ लिया है, जहां सरकार ने विशेष सत्र बुलाकर इस मुद्दे पर अपना रुख साफ करने और विपक्ष को घेरने की रणनीति अपनाई है। 28 अप्रैल को आयोजित विशेष सत्र में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा को संबोधित करते हुए नारी शक्ति वंदन अधिनियम को जल्द लागू किए जाने के लिए केंद्र सरकार के प्रयासों का समर्थन किया। इस सत्र का विषय ‘नारी सम्मान- लोकतंत्र में अधिकार’ रखा गया, जो अपने आप में इस बात का संकेत था कि सरकार इस मुद्दे को केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक और संवैधानिक अधिकार के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। मुख्यमंत्री ने सदन के सामने एक सर्वसम्मत संकल्प प्रस्ताव रखने की बात कही, जिसमें महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से केंद्र के प्रयासों का समर्थन किया जाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार महिलाओं के अधिकारों और सशक्तिकरण के लिए हर संभव कदम उठाने को प्रतिबद्ध है और इस दिशा में कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
सीएम धामी ने अपने संबोधन में कहा कि नारी शक्ति आज केवल भागीदारी तक सीमित नहीं रही, बल्कि नेतृत्व की भूमिका निभा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक महिलाओं को उनका उचित अधिकार नहीं मिल जाता, तब तक सरकार चैन से नहीं बैठेगी। उनके अनुसार, महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर किसी भी प्रकार की राजनीति नहीं होनी चाहिए और सभी दलों को मिलकर इस दिशा में काम करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद उन्होंने महिलाओं को उनका अधिकार देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने कहा कि अब जब केंद्र सरकार ने इस दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की है, तो विपक्ष इसे लेकर लोगों में भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया था कि परिसीमन के दौरान किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा और सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान इसी उद्देश्य से रखा गया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा 2023 में पेश किया गया था। इस अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। भाजपा इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम बता रही है, जबकि विपक्षी दलों ने इसके क्रियान्वयन और कुछ प्रावधानों को लेकर अपनी आपत्तियां जताई हैं। राजनीतिक स्तर पर बढ़ते इस टकराव के बीच उत्तराखंड में सरकार ने विपक्ष के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने का भी फैसला किया है। इस कदम को भाजपा की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत वह महिला आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष को घेरना चाहती है और जनसमर्थन जुटाने का प्रयास कर रही है।
देहरादून में सीएम धामी के नेतृत्व में ‘महिला आक्रोश मशाल रैली’ निकाली गई
राजनीतिक बहस के साथ-साथ सड़क पर भी महिला सशक्तिकरण की आवाज बुलंद होती नजर आई। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में मंगलवार को ‘महिला आक्रोश मशाल रैली’ का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। यह रैली शहर के प्रमुख स्थल गांधी पार्क से शुरू होकर घंटा घर तक निकाली गई। इस रैली का नेतृत्व स्वयं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने किया, जिससे इस आयोजन को विशेष महत्व मिला। बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि समाज में अपने अधिकारों और सम्मान को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ रही है। रैली के दौरान महिलाओं ने विभिन्न सामाजिक मुद्दों, अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े विषयों को लेकर अपनी आवाज उठाई। आयोजकों के अनुसार, इस रैली का उद्देश्य महिलाओं को एक मंच प्रदान करना था, जहां वे अपनी समस्याओं को खुलकर सामने रख सकें और समाज को यह संदेश दे सकें कि वे अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। पूरे कार्यक्रम के दौरान अनुशासन और शांति बनाए रखी गई, जिससे यह रैली एक सकारात्मक और प्रभावी संदेश देने में सफल रही। मुख्यमंत्री धामी ने इस अवसर पर महिलाओं की एकजुटता और उत्साह की सराहना की। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और सशक्तिकरण के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाएगा और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। रैली में शामिल महिलाओं ने कहा कि यह आयोजन उनके अधिकारों और न्याय की मांग को मजबूत करने का एक प्रयास है। उन्होंने भविष्य में भी इस तरह के आयोजनों के माध्यम से अपनी आवाज उठाने और संगठित रहने का संकल्प लिया। उनका कहना था कि जब तक समाज में महिलाओं को समान अधिकार और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक इस तरह के प्रयास जारी रहेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम को राज्य में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। एक ओर जहां विधानसभा में इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर आम महिलाएं भी अपने अधिकारों के लिए खुलकर सामने आ रही हैं। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि महिला सशक्तिकरण अब केवल नीतियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है। उत्तराखंड में महिला आरक्षण और सशक्तिकरण को लेकर जो माहौल बना है, वह आने वाले समय में राजनीति और समाज दोनों को प्रभावित कर सकता है। सरकार और जनता के स्तर पर हो रही ये पहलें इस दिशा में एक मजबूत और सकारात्मक बदलाव की ओर इशारा करती हैं।






