द्वारा: डॉ कुँवर राज अस्थाना, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक
पटवारी कितना ताकतवर होता है इस बात का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता हैं।
हरीश रावत ने भूमि फ्रॉड के मामलों की जांच के लिए आईजी गढ़वाल रेंज की अध्यक्षता में एक एसआईटी का गठन किया। SIT काम कर रही थी, लैंड फ्रॉड के मामलों में आपराधिक FIR दर्ज होने लगी, भूमाफियाओं में हड़कंप मच गया। SIT ने पाया कि सभी लैंड फ्रॉड के मामलों में संबंधित पटवारी की भूमिका संदिग्ध है। SIT ने यह निर्णय लिया कि लैंड फ्रॉड मामले में यदि पटवारी की भूमिका संदिग्ध होगी या उसने negligence का लाभ लिया होगा तो पटवारी के खिलाफ भी आपराधिक FIR दर्ज होगी। जैसे ही कुछ मामलों में पटवारियों के खिलाफ FIR हुई, पटवारियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। SIT द्वारा की जा रही अपराधिक FIR से भूमाफिया के सहयोगी वकील भी परेशान थे (उनमें से कई वकीलों को बाद में तत्कालीन जिलाधिकारी श्रीमती सोनिका ने जेल भिजवाया) ।
अंततः पटवारियों की जीत हुई, हरीश रावत दबाव में आ गए और SIT भंग कर दी गई और संजय गुंज्याल को कुमाऊं भेज दिया गया।
ऐसी ही पटकथा दुबारा लिखी जा रही है। फर्जी प्रमाण पत्र मामले में जांच और निलंबन के दायरे में आए पटवारी, एसडीएम अपूर्वा सिंह को निशाना बनाकर, सरकार पर दबाव बनाना चाहते हैं। जबकि एसडीएम केवल एक अधिकृत हस्ताक्षरी होता है, जांच करने का काम पटवारी का होता है, फिर रिपोर्ट पर कानूनगो, फिर तहसीलदार के सिग्नेचर होते हैं। अंतिम सिग्नेचर एसडीएम के होते है, आजकल तो DSC लगते है, वो भी नीतिगत फैसला ना हो तो DSC भी स्टेनो या पेशकार लगाता है या अन्य जो फाइल कराने के लिए अधिकृत किया गया हो।
एसडीएम, अपने अधीनस्थ की रिपोर्ट पर ही भरोसा करता है। प्रमाण पत्रों में तो त्रिस्तरीय रिपोर्ट लगी होती है। यदि आज एसडीएम अपूर्वा सिंह पर कोई कार्यवाही की जाती है तो पूरे प्रदेश में तहसीलों में काम ही ठप्प हो जाएगा।
सरकारी सिस्टम में दायित्व, कर्तव्य के साथ भरोसा और जवाबदेही बहुत जरूरी कम्पोनेंट है। इस पर डेंट यदि किसी ने लगाया है वो है पटवारी, उसकी रिपोर्ट अंतिम होती है। उसी पर सभी की मुहर लगती है। ये वक्त है, भ्रष्ट पटवारियों के कॉकस पर प्रहार करने का। शासन और प्रशासन को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अपूर्वा सिंह के बहाने पटवारी इतिहास न दुहरा पाएं


