समाज में समानता को कमजोर करने की कोशिश

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देश में सामाजिक समानता और समरसता की बात करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में यूजीसी द्वारा लाया गया नया नियम अब बड़े सवालों के घेरे में आ गया है। जिस नियम को शिक्षा व्यवस्था में सुधार के नाम पर पेश किया गया, वही नियम देखते-ही-देखते समाज में असमानता और विभाजन की बहस का केंद्र बन गया। इस फैसले ने न केवल स्कूल-कॉलेजों से जुड़े शिक्षाविदों को चौंकाया, बल्कि समाज के सवर्ण वर्ग में गहरी नाराजगी भी पैदा कर दी। यूजीसी के इस नियम के खिलाफ सबसे तीखी प्रतिक्रिया सवर्ण समाज की ओर से देखने को मिली। उत्तर प्रदेश से लेकर देश के कई राज्यों तक विरोध प्रदर्शन हुए, सड़कों पर नारे गूंजे और केंद्र सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग उठी। विरोध का सबसे प्रतीकात्मक और चौंकाने वाला कदम तब सामने आया, जब उत्तर प्रदेश के बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस नियम के विरोध में अपने पद से इस्तीफा देकर अपना आक्रोश सार्वजनिक किया। भाजपा के अधिकांश नेता इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बचते नजर आए। विपक्ष ने इसे सरकार की चुप्पी बताया, जबकि सवर्ण समाज ने इसे अनदेखी और असंवेदनशीलता करार दिया। मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां गुरुवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने यूजीसी के इस नियम पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी और अगली सुनवाई की तारीख 19 मार्च तय की। हालांकि अदालत की रोक के बावजूद, सवर्ण समाज का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ है। सोशल मीडिया पर भी इसका साफ असर दिख रहा है। शंभू नाथ गौतम, वरिष्ठ पत्रकार

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत सामाजिक समरसता होती है। विविधताओं से भरे देश में विचारों का टकराव स्वाभाविक है, लेकिन नीतियों का उद्देश्य जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। ऐसे समय में, जब सत्तारूढ़ दल स्वयं “कटोगे तो बंटोगे” जैसे नारों के माध्यम से सामाजिक एकता का संदेश देने की बात करता है, उसी दौर में शिक्षा से जुड़े एक फैसले ने देश के एक बड़े वर्ग के भीतर गहरी बेचैनी पैदा कर दी। यह बेचैनी केवल किसी वर्ग विशेष तक सीमित नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे राष्ट्रीय बहस का रूप लेती चली गई। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा 13 जनवरी को लागू किए गए नए नियम को लेकर सबसे अधिक प्रतिक्रिया सवर्ण समुदाय की ओर से सामने आई। इस फैसले को लेकर यह धारणा बनने लगी कि शिक्षा संस्थानों में समान अवसर की भावना कमजोर हो सकती है। समाज के उस हिस्से ने, जो खुद को लंबे समय से मुख्यधारा का सहभागी मानता रहा है, इस कदम को असंतुलित और जल्दबाजी भरा बताया। कई लोगों का कहना है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी बदलाव से पहले व्यापक विमर्श, सामाजिक प्रभाव का आकलन और जमीनी हकीकत की पड़ताल जरूरी होती है, जो इस मामले में दिखाई नहीं दी। जैसे-जैसे यह नियम स्कूलों और महाविद्यालयों में लागू होने लगा, वैसे-वैसे असंतोष खुलकर सामने आने लगा। उत्तर भारत से लेकर मध्य और पश्चिमी हिस्सों तक, कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। शांतिपूर्ण सभाओं से लेकर ज्ञापन सौंपने तक, नाराजगी के अलग-अलग रूप दिखे। प्रदर्शनकारियों का तर्क साफ था कि बिना पर्याप्त अध्ययन के लिया गया फैसला शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। उनका मानना था कि नीति निर्धारण में जल्दबाजी भविष्य में गंभीर परिणाम ला सकती है। इस पूरे घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश के बरेली से सामने आया एक घटनाक्रम चर्चा का केंद्र बन गया। सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री द्वारा अपने पद से इस्तीफा देने का फैसला केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं माना गया, बल्कि इसे वैचारिक असहमति के प्रतीक के रूप में देखा गया। उनके इस कदम ने यह संकेत दिया कि असंतोष केवल सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवस्था के भीतर बैठे जिम्मेदार अधिकारी भी इस निर्णय से असहज महसूस कर रहे हैं। उनके इस्तीफे ने बहस को और तेज कर दिया तथा इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर नई धार दी। राजनीतिक प्रतिक्रिया की बात करें तो तस्वीर कुछ अलग नजर आई। इतना व्यापक सामाजिक उबाल होने के बावजूद, सत्ताधारी दल के अधिकांश नेता सार्वजनिक रूप से इस विषय पर बोलने से बचते दिखाई दिए। न समर्थन में स्पष्ट बयान आया, न ही असहमति में। इस चुप्पी को लेकर सवाल उठने लगे कि क्या यह संवेदनशील मुद्दा राजनीतिक असहजता पैदा कर रहा है, या फिर इसे समय के साथ ठंडा पड़ने देने की रणनीति अपनाई गई है। विपक्षी दलों ने इस मौन को सरकार की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश बताया, जबकि आंदोलनरत लोगों ने इसे अनदेखी की संज्ञा दी। मामला धीरे-धीरे न्यायिक दायरे में पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका ने इस विवाद को कानूनी मंच पर ला खड़ा किया। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने प्रारंभिक दृष्टि में इस नियम के प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए और तत्काल प्रभाव से उस पर रोक लगाने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा से जुड़े किसी भी बदलाव का समाज पर दूरगामी असर पड़ता है, इसलिए हर पहलू की बारीकी से जांच आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नया ड्राफ्ट तैयार करने के निर्देश दिए। अगली सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख तय की गई, जिससे यह साफ हो गया कि यह मामला जल्द खत्म होने वाला नहीं है। हालांकि न्यायालय के इस हस्तक्षेप से अस्थायी राहत जरूर मिली, लेकिन सामाजिक असंतोष पूरी तरह शांत नहीं हुआ। सवर्ण समुदाय के भीतर यह भावना बनी रही कि सरकार और संबंधित संस्थान ने उनकी चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया। कई लोगों का कहना है कि अदालत की रोक समस्या का समाधान नहीं, बल्कि केवल एक विराम है। मूल सवाल अब भी जस का तस खड़ा है—क्या शिक्षा नीति बनाते समय सामाजिक संतुलन को पर्याप्त महत्व दिया गया? डिजिटल मंचों पर भी इस नाराजगी की गूंज साफ सुनाई दी। सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट, टिप्पणियां और प्रतिक्रियाएं सामने आती रहीं। अलग-अलग विचारधाराओं के लोग इस विषय पर खुलकर अपनी राय रखते नजर आए। कहीं इसे समानता के सिद्धांत पर चोट बताया गया, तो कहीं इसे नीति निर्माण की प्रक्रिया में संवाद की कमी का परिणाम कहा गया। हैशटैग के जरिए विरोध दर्ज कराया गया और कई वीडियो संदेशों में युवाओं ने भविष्य को लेकर अपनी आशंकाएं साझा कीं। शिक्षाविदों के एक वर्ग ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाए। उनका मानना है कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम या प्रवेश प्रक्रिया तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह समाज की दिशा तय करने वाला माध्यम है। ऐसे में किसी भी नियम का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सोच, अवसर और सहभागिता को भी प्रभावित करता है। उनका तर्क है कि यदि किसी निर्णय से समाज के किसी हिस्से में अलगाव की भावना जन्म लेती है, तो उस पर पुनर्विचार अनिवार्य हो जाता है। इस विवाद ने यूजीसी की कार्यप्रणाली पर भी रोशनी डाली। आरोप लगे कि नियम को लागू करने से पहले न तो राज्यों से पर्याप्त सलाह ली गई, न ही शिक्षण संस्थानों से व्यापक फीडबैक हासिल किया गया। कई कॉलेज प्रशासन इस बदलाव को लेकर असमंजस में दिखे। कुछ जगहों पर इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, जबकि कई संस्थान स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में प्रतीक्षा की स्थिति में थे। इस अव्यवस्था ने भी असंतोष को और गहरा किया। समाज के व्यापक हित की बात करें तो यह पूरा मामला एक चेतावनी की तरह देखा जा रहा है। नीतियां यदि लोगों को साथ लेकर नहीं चलतीं, तो उनका विरोध होना तय है। भारत जैसे बहुलतावादी देश में शिक्षा से जुड़ा हर फैसला सामाजिक ताने-बाने से जुड़ा होता है। ऐसे में संवाद, पारदर्शिता और अध्ययन की भूमिका और भी बढ़ जाती है। केवल प्रशासनिक आदेशों के जरिए जटिल सामाजिक सवालों का समाधान संभव नहीं हो पाता। फिलहाल स्थिति यह है कि नियम पर रोक लगी हुई है, बहस जारी है और समाज के अलग-अलग वर्ग अपनी-अपनी आशंकाओं के साथ सामने हैं। सरकार, यूजीसी और अन्य संबंधित संस्थानों के सामने यह चुनौती है कि वे इस मुद्दे को टकराव के बजाय संवाद के रास्ते से सुलझाएं। यदि वास्तव में लक्ष्य सामाजिक एकता और समान अवसर है, तो नीति निर्माण की प्रक्रिया में सभी पक्षों को भरोसे में लेना ही एकमात्र रास्ता है। आखिरकार, शिक्षा का उद्देश्य समाज को आगे बढ़ाना होता है, न कि विभाजन की रेखाएं खींचना। इस पूरे प्रकरण ने यह साफ कर दिया है कि जल्दबाजी में लिए गए फैसले न केवल व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि सामाजिक विश्वास को भी कमजोर करते हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में सरकार और यूजीसी इस अनुभव से क्या सीख लेते हैं और क्या भविष्य की नीतियां वास्तव में जोड़ने वाली साबित होंगी।

यूजीसी के नए नियम को लेकर सवर्ण समाज का मोदी सरकार पर फूटा गुस्सा

यूजीसी के नए नियम को लेकर उठे विवाद ने केंद्र की मोदी सरकार को एक बार फिर सामाजिक और राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि आखिर मोदी सरकार की भूमिका क्या रही। क्या यूजीसी ने यह नियम पूरी तरह स्वायत्त रूप से बनाया या फिर इसके पीछे सरकार की सहमति और दिशा-निर्देश भी शामिल थे। चूंकि यूजीसी केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाला निकाय है, इसलिए स्वाभाविक रूप से सवाल सरकार तक पहुंचता है। विरोध करने वाले वर्गों का कहना है कि यदि सरकार समय रहते इस पर हस्तक्षेप करती और व्यापक विमर्श कराती, तो स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती। सामाजिक दृष्टि से देखें तो भाजपा के लिए यह मुद्दा असहज करने वाला साबित हुआ है। इतना बड़ा सामाजिक विवाद होने के बावजूद पार्टी के बड़े नेताओं की ओर से कोई स्पष्ट और ठोस बयान सामने नहीं आया। यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या सरकार इस मुद्दे पर बैकफुट पर है, या फिर यह मान लिया गया है कि समय के साथ विरोध की तीव्रता कम हो जाएगी। हालांकि सवर्ण समाज के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि उनकी चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया गया। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस पूरे मामले में निर्णायक मोड़ लेकर आया। अदालत ने भेदभाव से जुड़े रेगुलेशन पर रोक लगाते हुए यह साफ संकेत दिया कि शिक्षा नीति से जुड़े फैसलों में संवैधानिक मूल्यों और समान अवसर की भावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट की इस टिप्पणी को सरकार और यूजीसी दोनों के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। अगली सुनवाई की तारीख तय होने के बाद अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि आगे कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में जाती है।
इस बीच सोशल मीडिया पर भी सरकार के खिलाफ नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। सवर्ण समाज से जुड़े कई संगठनों और युवाओं ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सवाल उठाए हैं कि क्या यह नियम किसी खास वर्ग को निशाना बनाकर बनाया गया। पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियों के जरिए यह संदेश दिया जा रहा है कि यदि सरकार ने समय रहते भरोसा बहाल नहीं किया, तो इसका राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है। सबसे अहम सवाल अब आने वाले चुनावों को लेकर उठ रहा है। क्या यह मुद्दा भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा। सवर्ण वोट बैंक को भाजपा का पारंपरिक समर्थन माना जाता रहा है। यदि इस वर्ग के भीतर नाराजगी लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि केवल एक मुद्दा चुनाव परिणाम तय करेगा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि ऐसे फैसले सरकार की छवि को प्रभावित करते हैं। मोदी सरकार की राजनीति अब तक मजबूत नेतृत्व और निर्णायक फैसलों की रही है, लेकिन इस मामले में जल्दबाजी का आरोप उस छवि को चुनौती देता है। विरोध करने वालों का कहना है कि यदि सरकार “सबका साथ, सबका विकास” की बात करती है, तो नीति निर्माण में भी उसी भावना का पालन होना चाहिए। शिक्षा जैसे क्षेत्र में किसी भी बदलाव से पहले सामाजिक संतुलन, समानता और संभावित टकरावों पर गंभीरता से विचार जरूरी है। फिलहाल स्थिति यह है कि नियम पर रोक लगी हुई है, असंतोष पूरी तरह शांत नहीं हुआ है और सरकार की अगली रणनीति पर सबकी नजर है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या मोदी सरकार इस मुद्दे पर पुनर्विचार करती है, यूजीसी को व्यापक अध्ययन के निर्देश देती है और संवाद के जरिए भरोसा बहाल करने की कोशिश करती है। क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक चुनौती के रूप में भी सामने आ सकता है।

यूजीसी ने अपनी गाइडलाइन में किए गए दो अहम बदलावों ने नए विवाद को जन्म दे दिया

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी। कमोबेश देश भर के हायर एजुकेशन सिस्टम को यही आयोग कंट्रोल करता है। 12वीं के बाद जो भी छात्र ग्रेजुएशन या आगे की पढ़ाई के लिए एनरॉल होते हैं, उन्हें इसके नियमों से सामना होता है। अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जन जाति (एसटी) के छात्रों के लिए यूजीसी ने कुछ खास नियम बना रखे हैं। कॉलेज में इसका पालन जरूरी होता है। पहली बार वही नियम ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की जातियों से आने वाले छात्रों को शामिल किया गया है। यूजीसी ने अपनी गाइडलाइन में दो अहम बदलाव किए हैं, सवर्ण यानी जनरल कैटेगरी से आने छात्रों के साथ भेदभाव बताया जा रहा है। तकरीबन पूरे देश में इसका विरोध हुआ। उनका मानना है कि सिर्फ जनरल कैटेगरी भर के होने से ही वो दोषी हो जाएंगे। सरकार की ओर से कोई बड़ा नेता इस मसले पर मुंह खोलने को तैयार नहीं है। देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान हैं और जिस यूजीसी ने इस नियम को लागू किया है, उसके चेयरमैन विनीत जोशी हैं। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को जड़ से मिटाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी 2026 को नई नियमावली लागू की । 15 जनवरी से प्रभावी हुए इन नियमों का उद्देश्य एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के छात्रों और शिक्षकों के लिए परिसर में सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना है। नियम के मुताबिक जाति-आधारित भेदभाव इससे समाप्त होगा। हालांकि, इन नियमों ने आरक्षण जैसे एक नए विवाद को जन्म दे दिया। सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों ने इसे ‘सामान्य वर्ग विरोधी’ करार देते हुए सड़कों पर प्रदर्शन शुरू कर दिया है। विवाद का मुख्य केंद्र झूठी शिकायतों के खिलाफ दंड का प्रावधान हटाना और सवर्णों को इस सुरक्षा चक्र से बाहर रखना है। यूजीसी ने ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026’ के तहत हर संस्थान में समान अवसर केंद्र और इक्विटी समितियों का गठन अनिवार्य कर दिया है। इसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग को भी जातिगत भेदभाव के दायरे में शामिल किया गया है। इन नियमों के अनुसार, किसी भी संस्थान के प्रमुख (कुलपति या प्राचार्य) को भेदभाव के खिलाफ सीधे जवाबदेह बनाया गया है।

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