बिहार की सत्ता में एक बार फिर वही कथा दोहराई गई जहां चुनावी आंकड़ों से बड़ी होती है नेतृत्व की निर्णायक क्षमता। भाजपा इस बार विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, मगर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का सम्मान अंततः नीतीश कुमार को ही मिला। पिछले 20 वर्षों से राज्य की राजनीति के केंद्र में मौजूद नीतीश ने 10वीं बार शपथ लेकर साबित कर दिया कि बिहार में सत्ता समीकरण चाहे जितनी तेजी से बदलें, सत्ता की धुरी आज भी वही हैं। चुनाव नतीजों के बाद उनके दोबारा मुख्यमंत्री बनने को लेकर गहरी अनिश्चितता बनी हुई थी। एनडीए के भीतर खींचतान, भाजपा की बढ़त और जेडीयू की कमजोर स्थिति को देखते हुए सवाल उठने लगे थे कि क्या इस बार मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी नए चेहरे को मिलेगी। लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम ने मात्र तीन हफ्तों में पूरा परिदृश्य बदल दिया। 20 नवंबर को जब नीतीश कुमार 26 मंत्रियों के साथ शपथ मंच पर पहुंचे, तब यह स्पष्ट हो चुका था कि भाजपा ने न सिर्फ उनका नेतृत्व स्वीकार किया है, बल्कि बिहार के लिए स्थिरता और प्रशासनिक अनुभव को प्राथमिकता देते हुए पुरानी व्यवस्था पर ही भरोसा जताया है। इस तरह नीतीश ने एक बार फिर यह संदेश दे दिया कि बिहार की सत्ता में अंतिम फैसला आज भी उनके ही हाथों से गुजरता है। दिव्य हिमगिरि रिपोर्ट
बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी अंततः नीतीश कुमार को ही मिली। पार्टी ने माना कि राज्य में स्थिरता, अनुभव और प्रशासनिक पकड़ सबसे महत्वपूर्ण हैं, इसलिए सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री पद पर दावा नहीं किया। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तक स्थिति साफ नहीं थी। 29 अक्टूबर तक यह तय नहीं था कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा। भारतीय जनता पार्टी की बढ़त को देखते हुए कई नये नाम आगे बढ़ रहे थे, लेकिन 20 नवंबर को शपथ ग्रहण होते ही यह स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का नेतृत्व एक बार फिर नीतीश कुमार को ही सौंपा जाएगा।भारतीय जनता पार्टी ने नीतीश पर भरोसा इसलिए जताया क्योंकि उनके पास शासन का लंबा अनुभव है, गठबंधन राजनीति संभालने की कुशलता है और राज्य में उनकी स्वीकार्यता आज भी मजबूत है। यही कारण रहा कि पार्टी ने सबसे बड़ा निर्णय अनुभव और स्थिर नेतृत्व के पक्ष में लिया। नीतीश कुमार पिछले दो दशक से बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं। कई उतार-चढ़ाव आये, गठबंधन बदले, समीकरण बने, बिगड़े, लेकिन हर बार सत्ता की कमान अंततः उन्हीं के हाथों में लौट आई। यही उनकी राजनीतिक पकड़ की सबसे बड़ी पहचान बनी हुई है। नई सरकार की प्राथमिकताएं भी शपथग्रहण के तुरंत बाद सामने आ गईं। सड़क और पुल निर्माण, रोज़गार और कौशल विकास, कानून-व्यवस्था में सख्ती, तथा सामाजिक योजनाओं के विस्तार को सरकार का मुख्य एजेंडा बनाया गया है। मुख्यमंत्री ने पहली बैठक में अधिकारियों को संकेत दिया कि कामकाज की गति में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर एक नया संतुलन भी दिखाई दिया जिसमें नेतृत्व नीतीश के पास है जबकि राजनीतिक शक्ति भारतीय जनता पार्टी के पास। इसी संतुलन के आधार पर मंत्रिमंडल में विभागों का बंटवारा किया गया। 20 नवंबर को कुल 26 मंत्रियों ने शपथ ली। इसमें क्षेत्रीय और जातीय संतुलन का ध्यान रखा गया, साथ ही नये और अनुभवी चेहरों को मिलाकर सरकार को व्यापक आधार दिया गया।पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संकेत यही है कि बिहार की राजनीति में परिस्थितियां कैसी भी हों, अंतिम निर्णय में नीतीश कुमार की भूमिका आज भी निर्णायक बनी हुई है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने भी इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए नेतृत्व एक बार फिर उनके हाथों में सौंप दिया है।
बिहार में मुख्यमंत्री पद को लेकर हुए घटनाक्रम के पीछे कई दिनों तक चली खींचतान
बिहार में मुख्यमंत्री पद को लेकर हुए घटनाक्रम के पीछे कई दिनों तक चली खींचतान, अंदरूनी बातचीत और राजनीतिक समीकरणों का बड़ा खेल छिपा हुआ था। चुनाव नतीजों के बाद भारतीय जनता पार्टी के भीतर पहली बार यह चर्चा जोर पकड़ने लगी कि सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण नेतृत्व उसी का होना चाहिए। कई नेताओं ने इसे भीतर ही भीतर तर्क के साथ उठाया, लेकिन सार्वजनिक रूप से पार्टी ने चुप्पी साधे रखी। दूसरी ओर, जेडीयू ने शुरुआत से ही यह संकेत दिए कि नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बनेंगे। जेडीयू के वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि गठबंधन की स्थिरता का आधार नीतीश ही हैं और बिहार में प्रशासनिक सुधारों का अनुभव भी उन्हीं के पास है। यही वजह रही कि जेडीयू ने अपने रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई। इन सबके बीच, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व ने लगातार स्थिति पर नजर बनाए रखी। कई दौर की बैठकों में एक बात साफ होने लगी यदि मुख्यमंत्री के चेहरे पर सहमति नहीं बनी तो गठबंधन में शुरुआती दौर में ही अस्थिरता पैदा हो सकती है, जिसका नुकसान सरकार की छवि और जनता दोनों को होगा। फिर भी, यह आसान फैसला नहीं था। भाजपा के भीतर दो लाइनें थीं, एक खेमा चाहता था कि भाजपा अपना मुख्यमंत्री दे, ताकि बदली हुई राजनीतिक ताकत का पूरा लाभ मिल सके। दूसरा खेमा मानता था कि गठबंधन की स्थिरता अधिक महत्वपूर्ण है और नीतीश जैसा अनुभवी चेहरा आने वाले वर्षों में बेहतर समन्वय सुनिश्चित करेगा। अंततः शीर्ष नेतृत्व ने वही रास्ता चुना, जिससे सरकार मजबूत और स्थिर बन सके। भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद स्वीकार करवाकर यह संदेश दे दिया कि गठबंधन की एकता और राज्य की स्थिरता उनके लिए सर्वोपरि है। इस घटनाक्रम ने यह भी साफ कर दिया कि नीतीश कुमार अभी भी बिहार राजनीति के उस बिंदु पर खड़े हैं जहां सत्ता की बुनियादी चाबियाँ उनके ही पास रहती हैं। भाजपा को भले ही राजनीतिक ताकत मिली हो, लेकिन मुख्यमंत्री पद का निर्णय अनुभव और व्यापक स्वीकार्यता के आधार पर हुआ। सियासी हलकों में यह सवाल अब भी गूंज रहा है।क्या नीतीश कुमार की यह 10वीं पारी स्थिर होगी या आने वाला समय फिर किसी नए समीकरण की शुरुआत करेगा? लेकिन फिलहाल, सत्ता का संतुलन पूरी तरह नीतीश के पक्ष में झुक चुका है और भाजपा ने इसे स्वीकार कर लिया है।
नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य एक नए दौर की ओर बढ़ेगा: पीएम मोदी
बिहार के ऐतिहासिक शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित तमाम वरिष्ठ भाजपा नेता मौजूद रहे। पटना के राजभवन में हुए इस कार्यक्रम ने राज्य की राजनीति का पूरा माहौल बदल दिया। भाजपा इस बार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन फिर भी पार्टी ने मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का नाम आगे बढ़ाकर यह दिखा दिया कि बिहार में स्थिरता और विकास के लिए वह अनुभव को प्राथमिकता देने को तैयार है। शपथ के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार की तारीफ करते हुए कहा कि “बिहार के विकास के लिए हमारा गठबंधन मजबूत है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य एक नए दौर की ओर बढ़ेगा। केंद्र और राज्य मिलकर बिहार को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।” पीएम के इस बयान ने साफ कर दिया कि भाजपा नेतृत्व ने न केवल नीतीश को स्वीकार किया है बल्कि उनके अनुभव को बिहार के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना है। समारोह में पीएम मोदी और नीतीश कुमार के बीच गर्मजोशी भी चर्चा का विषय रही। मोदी ने उनके साथ मंच साझा करते हुए कहा कि बिहार में तेज गति से काम करने का समय आ गया है और केंद्र सरकार हर योजना को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में राज्य को पूरा सहयोग देगी। इस शपथ ग्रहण में 26 मंत्रियों ने भी पद की शपथ ली। भाजपा को मिले मजबूत जनादेश के बावजूद नीतीश के नेतृत्व को स्वीकार करना इस बार की राजनीति का सबसे अहम संदेश माना जा रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि बिहार की सामाजिक संरचना, प्रशासनिक अनुभव और जनता के प्रति नीतीश की पकड़ को ध्यान में रखते हुए ही यह फैसला लिया गया है। पीएम मोदी की मौजूदगी और उनके सकारात्मक वक्तव्य ने नीतीश कुमार की राजनीतिक स्थिति को और मजबूत कर दिया है। अब बिहार की राजनीति नए अध्याय की ओर बढ़ रही है जहां भाजपा और जदयू साथ मिलकर सत्ता की डोर थामे हुए हैं।




