हिमालय की गोद से उठी एक सशक्त वैज्ञानिक पहचान: डॉ. कुसुम अरुणाचलम

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उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल के एक छोटे से गाँव सेंडुल से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाली डॉ. कुसुम अरुणाचलम का जीवन संकल्प और शैक्षणि एक उत्कृष्टता की एक अनूठी कहानी है। अपने पिता, प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. बी.पी. मैठानी के आदर्शों पर चलते हुए, उन्होंने नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और हिमालयी पारिस्थितिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुसंधान किए।

अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और अपनी शिक्षा पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
मेरा जन्म उत्तराखंड के शांत और प्रकृति से समृद्ध गाँव सेंडल (टिहरी गढ़वाल) में हुआ। मेरा व्यक्तित्व और जीवन के प्रति दृष्टिकोण मेरे माता-पिता की प्रेरणा से निर्मित हुआ है। मेरे पिता, डॉ. बी. पी. मैठानी, एक दूरदर्शी वैज्ञानिक, शिक्षाविद् और संस्थान निर्माता थे. जिन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में ग्रामीण विकास को नई दिशा दी। उन्होंने मुझे सिखाया कि शिक्षा समाज और राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त उपकरण है। मेरी माता, श्रीमती सरोज मैठानी, एक स्नेहमयी और धैर्यशील गृहिणी थीं. जिन्होंने मुझे कठिन परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखने की शक्ति दी। चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने और माँ के अस्वस्थ रहने के कारण, बचपन से ही घर की जिम्मेदारियां मुझ पर आ गई. जिसने मुझे समय से पहले परिपक्व बना दिया।
मेरी शिक्षा की यात्रा उपलब्धियों और संकल्पों से भरी रही है:
1978 में पाँचवीं कक्षा में मैंने बेरीनाग तहसील में प्रथम स्थान प्राप्त किया, जिसके लिए मुझे मेधावी छात्रा छात्रवृत्ति मिली। 1983 में दसवीं के दौरान, लगातार स्थान परिवर्तन के कारण मैंने निजी रूप से परीक्षा दी और आत्म-अनुशासन से 72% अंक प्राप्त किए। मैंने गुवाहाटी के प्रतिष्ठित कॉटन कॉलेज से 1989 में वनस्पति विज्ञान में स्नातक किया। इसके बाद 1992 में नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, शिलांग से प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 1993 में प्रोफेसर आर. एस. त्रिपाठी के मार्गदर्शन में मैंने इकोलॉजी प्रयोगशाला में अपनी पीएचडी प्रारंभ की। मेरा शोध पूर्वोत्तर भारत के झूम कृषि क्षेत्रों की पारिस्थितिकी और उनके पुनरुद्धार पर केंद्रित था। मेरे शैक्षणिक जीवन में निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ-साथ मुझे विभिन्न स्तरों पर छात्रवृत्तियों से भी सम्मानित किया गया। पाँचवीं कक्षा में बेरीन तहसील में प्रथम स्थान प्राप्त करने के बाद मेने आगे की शिक्षा के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। यह न केवल एक आर्थिक सहयोग था, बल्कि मेरे आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की प्रेरणा का भी स्रोत बना। मेरी शैक्षणिक उपलब्धियों को देखते हुए मुझे स्नातकोत्तर स्तर से आगे की पढ़ाई के दौरान निरंतर मेधा आधारित छात्रवृत्तियाँ प्राप्त होती रहीं। इन छात्रवृत्तियों ने मेरे शोध और उच्च शिक्षा के मार्ग को सशक्त बनाया तथा मुझे बिना किसी बाधा के अपने अकादमिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
आपके प्रोफेशन के बारे में बताएं या किस तरह से आप इस प्रोफेशन में आएं और आप किसे प्रभावित हुए? मेरा प्रोफेशन मुख्य रूप से वैज्ञानिक
अनुसंधान, शिक्षण और शैक्षणिक प्रशासन का संगम है। ज्ञान की सीमाओं को तोड़ने की मेरी निरंतर जिज्ञासा ने मुझे शोध की दिशा में प्रेरित किया। मैं अपने पिता के दूरदर्शी दृष्टिकोण और उनकी संस्थान निर्माण की क्षमता से अत्यधिक प्रभावित रही हूँ। मैं इस क्षेत्र में एक शोधकर्ता के रूप में आई, जहाँ मैंने मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम क्षेत्रों में गहन अध्ययन किया। मेरा कार्य मुख्य रूप से हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र की गहराई को समझने पर केंद्रित रहा है। मैंने कंवल अकादमिक शोध तक सीमित न रहकर उसे समाज, किसानों और नीति-निर्माण से जोड़ने का प्रयास किया है। शिक्षण, शोध और प्रशासन-तीनों क्षेत्रों में सक्रिय रहते हुए, मैंने विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष, डीन, निदेशक तथा कार्यवाहक कुलपति जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया है। इन भूमिकाओं में मेरा प्रयास हमेशा यही रहा कि शिक्षा और शोध को समाज के साथ जोड़ा जाए और एक ऐसा शैक्षणिक वातावरण बनाया जाए, जहाँ नवाचार, संवेदनशीलता और उत्कृष्टता साथ-साथ विकसित हों। मेरे शैक्षणि एक और शोध कार्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त हुई है, जिसके अंतर्गत मुझे विभिन्न देशों-जर्मनी, श्रीलंका, मलेशिया और थाईलैंड की शैक्षणिक एवं शोध संस्थाओं के साथ सहयोग स्थापित करने का अवसर मिला।
आपकी उपलब्धियों के बारे में बताएं आपने क्या काम किया है?
मेरे कार्यों ने पर्यावरण विज्ञान और हिमालयी पारिस्थितिकी में नए आयाम स्थापित किए हैं। मेरी प्रमुख उपलब्धियां निम्नलिखित हैं: पीएच.डी. के बाद मेरा शोध हिमालयी पारिस्थितिक तंत्रों की गहराई से समझ विकसित करने की दिशा में निरंतर विस्तारित होता गया। मैंने पश्चिमी और पूर्वी हिमालय-दोनों क्षेत्रों में कार्य करते हुए मृदा कार्बन गतिकी, सूक्ष्मजीव विविधता, पारिस्थितिकी सेवाओं, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, तथा एग्रोफॉरेस्ट्री प्रणालियों पर व्यापक और बहुआयामी शोध किया। मेरे कायर्यों ने यह स्थापित किया कि हिमालय केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र है, जिसकी स्थिरता देश के पर्यावरणीय संतुलन और जलवायु सुरक्षा से सीधे जुड़ी हुई है। मेरे द्वारा संचालित एवं सहयोगित अनेक शोध परियोजनाएँ-जैसे हिमालयी एग्रोफॉरेस्ट्री प्रणालियों में कार्बन गतिकी, क्रिटिकल जोन ऑब्जर्वेटरी, जलवायु-सहनीय कृषि, पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का दस्तावेजीकरण, तथा पारिस्थितिकी सेवाओं का मूल्यांकन प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय विकास, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन तथा सतत विकास लक्ष्यों को सुदृढ़ करने में योगदान देती रही हैं। इन परियोजनाओं के माध्यम से मैंने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से लगभग 10 करोड़ रुपये से अधिक की शोध निधि विश्वविद्यालय में लाने और उसके प्रभावी उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मैंने अपने शोध को केवल अकादमिक सीमाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज, किसानों और नीति-निर्माण से जोड़ा। विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में समुदाय-आधारित शोध के माध्यम से मैंने यह स्थापित किया कि स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय ही दीर्घकालिक सतत विकास का आधार है। मेरे जीवन का एक अत्यंत महत्वपूण् आयाम रहा है-मार्गदर्शन। अब तक मैं 20 से अधिक पीएच.डी. शोधार्थियों, 6 पोस्ट-डॉक्टरल शोधकर्ताओं तथा अनेक स्नातकोत्तर छात्रों का मार्गदर्शन कर चुकी हूँ। मेरे मार्गदर्शन में तैयार हुए विद्यार्थी आज देश-विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्यरत हैं और विज्ञान, नीति तथा समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। यह मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है कि मैं नई पीढ़ी के वैज्ञानिकों को तैयार करने में योगदान दे सकी। एक महिला वैज्ञानिक के रूप में मेरी यात्रा प्रेरणा और संघर्ष दोनों से भरी रही है। मुझे भारत सरकार द्वारा “यंग वुमन बायोसाइंटिस्ट अवॉर्ड”, “वुमन बायोसाइंटिस्ट अवॉर्ड” सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया है, जो न केवल मेरी उपलब्धियों का प्रमाण है. बल्कि विज्ञान में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और नेतृत्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत भी है। इसके साथ ही, मुझे देश की विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं में विशेषज्ञ के रूप में योगदान देने का अवसर प्राप्त हुआ है। मैंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की महिला वैज्ञानिक योजनाओं, राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी, संघ लोक सेवा आयोग तथा अन्य राष्ट्रीय समितियों में विशेषज्ञ सदस्य के रूप में कार्य करते हुए नीतिगत निर्णयों, चयन प्रक्रियाओं और वैज्ञानिक दिशा निर्धारण में अपनी भूमिका निभाई है।
आपके भविष्य की योजनाओं के बारे में बताएं?
आज जब मैं अपने जीवन की यात्रा को देखती हूँ, तो यह केवल मेरी व्यक्तिगत कहानी नहीं, बल्कि एक व्यापक दृष्टि को कहानी है-जहाँ विज्ञान, समाज और प्रकृति एक साथ जुड़े हुए हैं। एक छोटे से हिमालयी गाँव से निकलकर, सूक्ष्मजीवों की अदृश्य दुनिया को समझते हुए, हिमालय के जटिल पारिस्थितिक तंत्रों पर कार्य करते हुए, और सैकड़ों विद्यार्थियों के जीवन को दिशा देते हुए यह मेरी पहचान की यात्रा है, जो आज भी निरंतर आगे बढ़ रही है। मेरे भविष्य के लक्ष्य विज्ञान, समाज और प्रकृति के बीच एक सशक्त सेतु स्थापित करने पर केंद्रित हैं। मैं विशेष रूप से हिमालयी पारिस्थितिक तंत्रों में “नेचर बेस्ड सॉल्यूशन्स” को आगे बढ़ाते हुए जलवायु परिवर्तन, कार्बन प्रबंधन और पारिस्थितिकी सेवाओं के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर योगदान देना चाहती हैं। मेरा उद्देश्य “ट्रीज आउटसाइड फॉरस्ट” और शहरी हरित क्षेत्रों पर एकीकृत शोध को विकसित कर नीति निर्माण से जोड़ना है, ताकि सतत और समावेशी विकास सुनिश्चित हो सके। साथ ही, मैं युवाओं-विशेषकर महिला वैज्ञानिकों को मार्गदर्शन देकर एक नई पीढ़ी तैयार करना चाहती हूँ, जो विज्ञान को समाज के हित में प्रयोग करे। अंतरराष्ट्रीय सहयोग, उन्नत शोध केंद्रों की स्थापना और समुदाय आधारित समाधान विकसित करना।
मेरे आगामी प्रयासों के प्रमुख आयाम रहेंगे आप दिव्य हिमगिरी पत्रिका के माध्यम से क्या संदेश देना चाहेंगे?
मैं दिव्य हिमगिरी पत्रिका के माध्यम से यह संदेश देना चाहती हैं कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, यदि संकल्प मजबूत हो तो सफलता निश्चित है। मेरी अपनी यात्रा एक छोटे से हिमालयी गाँव से शुरू होकर सुक्ष्मजीवों की अदृश्य दुनिया और विश्वविद्यालय के शीर्ष पदों तक पहुँची है. जो यह दर्शाती है कि दृढ़ संकल्प और आत्म-अनुशासन से कोई भी बाधा पार की जा सकती है। विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं के लिए मेरा संदेश है कि शिक्षा को केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम न समझें, बल्कि इसे समाज और राष्ट्र निर्माण के उपकरण के रूप में देखें। विज्ञान को प्रयोगशालाओं से निकालकर खेतों और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना आवश्यक है। स्थानीय पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय ही हमारे देश के दीर्घकालिक सतत विकास का असली आधार है। अपनी जड़ों से जुड़े रहें और अपनी क्षमताओं पर अटूट विश्वास रखें।

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