आयुर्वेदिक चिकित्सा से समाज को स्वास्थ्य लाभ पहुंचा रहे है वैद्य हर्ष सहगल

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देहरादून स्थित त्रिलोक आयुर्वेद चिकित्सालय के फाउंडर व सीईओ वैद्य हर्ष सहगल ने विगत 26 वर्षों से आयुर्वेदिक चिकित्सा के माध्यम से अनगिनत लोगों को गंभीर बीमारियों से निजात दिलाई है। एक चिकित्सक के रूप में कई गंभीर बीमारियों के पारंपरिक उपचार से रोकथाम हेतु लगातार कार्य कर रहे है। उत्तराखंड के कई प्रतिष्ठित अवाडों से सम्मानित वैद्य हर्ष सहगल से उनके इस सफर के बारे में लोकेश राज अस्थाना द्वारा विस्तार से बात की गई। पेश है बातचीत के कुछ अंश।

अपनी पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइये।
मैं एक मिडिल क्लास फैमिली से सम्बंध रखता हूँ। मेरा जन्म हरिद्वार में हुआ है लेकिन शुरूआती स्कूली शिक्षा देहरादून में हुई है। मेरे पिताजी पंजाब नेशनल बैंक में विभिन्न राज्यों के प्रमुख रहे है जिस कारण मुझे देश के राज्यों के कई शहरों में रहने का मौका मिला।

चिकित्सा के क्षेत्र में कैसे आना हुआ और इसके पीछे किसकी प्रेरणा रही?
शिक्षा का हमारे परिवार में बहुत प्रभाव रहा है तथा घर के सभी सदस्य वेल एजुकेटेड थे इसिलिए हमसे भी यही अपेक्षा रखी गयी कि हम भी खूब पढे और एक अच्छा कैरियर बनाये। मेरे माता-पिता चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनू और अपेक्षा थी कि इस क्षेत्र में कुछ नया भी करूं। जब यह तय हो गया कि मेडिकल फील्ड में ही जाना है तब मुझे आयुर्वेद से ज्यादा अच्छी संभावना कहीं नजर नहीं आई और बीएएमएस तथा आयुर्वेद से एमडी करने के बाद समाज की सेवा करने का भाव मन में लेकर आयुर्वेद का अपना सफर शुरू किया।

त्रिलोक आयुर्वेद चिकित्सालय के बारे में बताईये।
आयुर्वेद के जरिए मरीजों को ठीक करने के उद्देश्य से देहरादून में वर्ष 2000 में त्रिलोक आयुर्वेद चिकित्सालय की स्थापना की गई। हम हमारे चिकित्सालय में रोगियों का विशुद्ध आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों पर आधारित उपचार करते है। हम हमारी मेडिसिन में इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटियों का खुद से ही संग्रहण करते हैं और दवाईयां तैयार करने का
वैद्य हर्ष सहगल बीएएमएस, एमडी (आयु.) फडतर और सीईओ, बिलांक आयुर्वेद देहरादून, ऋषिकेश हमारा खुद का ही फारमूलेशन है। आज हमारे त्रिलोक आयुर्वेद चिकित्सालय को 26 वर्ष पूर्ण हो चुके है।

आयुर्वेदिक चिकित्सा के बारे में विस्तार से बताईयें।
आयुर्वेद का हर मरीज अलग अलग होता है। मरीज के वेरिएबल्स होते हैं। उन बेरिएबल्स के आधार पर चिकित्सा को सिंक्रोनाईज किया जाता है। चिकित्सा कभी सटैर्डराईज नहीं हो सकती है। सेम डिजीज के अगर 10 मरीज होंगे तो 10 मरीज के उपर चिकित्सा का फार्मूलेशन अलग अलग हो जायेंगे। ये आयुर्वेदिक चिकित्सा का आधार है।

आपकी प्रमुख उपलब्धियां क्या-क्या रही?
कैरियर की शुरुआत में ही जब मैं 24 वर्ष का था तभी अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) रोग में हमें बहुत बडा ब्रेक थ्रू मिला। हमने इसको बहुत ही सफल तरीके से आयुर्वेदिक चिकित्सा से ठीक किया। वहां से फिर ऑटिजम, दूसरी डिजेनरेटिड डिसऑर्डर, मेटॉबालिक डिसआर्डर, ऑटोम्यूनिक डिसआर्डर और कोविड आते-आते हम हार्ट फेलियर को भी ट्रीट करने लगे थे। पिछले लगभग 7 सालों से हम हार्ट ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में कार्य कर रहे है। चूंकि एक आर्गन के हिसाब से इसकी उपलब्धता बहुत सिमित होती है, दूसरे हार्ट ट्रांसप्लांट होने के बाद उसके सक्सेस के चांसेज बहुत लीमिटेड होते है, फिर उम्रभर की दवाईयां और पाबंदियां और ट्रांसप्लांट के बाद कितनी उम्र है वो भी एक इश्यू है। आयुर्वेद के थ्रू हमने उस फारमूलेशन का पूरा खाका डिजाइन किया है कि जहां पर हार्ट टांसप्लाट की जरूरत होती है अगर हमारे पास मरीज सही समय पर आ जाता है तो हम उसे रिवरसल से लेकर कम्पलीट की ओर लेकर जाते है। ऐसे कई केसों को हमने अब तक ठीक करने में सफलता प्राप्त की है। बहुत सारे मरीज ठीक हो चुके है और उसी दिशा में हम अपनी यात्रा को आगे बढ़ा रहे है। इसके अलावा गैस आधारटी ऑफ इण्डिया (गेल) में हमने प्रिवेटिव कार्डियोलॉजी को लेकर भी एक प्रेजेंटेशन दिया जिसमें हमने बताया कि आयुर्वेदिक मेडिसिन, डाईट, लाईफ स्टाइल चेंज करके किस तरह हम मरीज को पूरी तरह से ठीक करने की दिशा में ले जा सकते है।
आयुर्वेद के द्वारा विभिन्न बीमारियों पर किये जा रहे शोधों के चलते मुझे विभिन्न संस्थाओं द्वारा उत्राखण्ड रत्न, उत्तराखण्ड गौरव, एक्सीलेंस अवार्ड, डॉक्टर ऑफ द ईयर इत्यादि अवाडों से नवाजा गया है। लेकिन एक चिकित्सक होने के नाते मेरा सबसे बड़ा अवार्ड तब होता है जब मेरे क्लीनिक से मेरा मरीज ठीक होकर जाता है। तब मुझे सच्चा सुकून प्राप्त होता है।

भविष्य की आपकी क्या-क्या योजनाएं है?
इंसान के जीवन के दो महत्वपूर्ण आर्गन हार्ट और लीवर होते है जिनके कभी कभी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ जाती है। हालांकि यह इतना आसान नहीं होता। कॉम्प्लीकेटेड होने के साथ साथ बहुत खर्चीला भी होता है। इस सिचुएशन में मरीज के परिवार के लिए बड़ी मुश्किल हो जाती है विशेषकर जो यंग जनरेशन है उनके लिए। पिछले कुछ वर्षों से हम इन्हीं दो आर्गन के ट्रांसप्लांट को ईजी बनाने की दिशा में कार्य कर रहे है और जन-जन में इस बात को पहुंचा रहे है।

दिव्य हिमगिरी के माध्यम से पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
पाठकों को यहीं संदेश देना चाहेंगे कि आयुर्वेद के अनुसार ही अपनी दिनचर्या को बनाकर रखे। जितनी भूख हो उतना खाना खाए, पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, व्यायाम करें. सैर करे तथा बुरी आदतों से जितना हो सके उतना बचे और एक स्वस्थ जीवन का आनंद ले। इन तीन चीजों का हमेशा ध्यान रखे अग्नि- भूख लगने पर ही खाना खाए और खाना पच जाए।
कोष्ठ सुबह पेट अच्छे से साफ हो जाए।
निंद्रा रात्त को नींद अच्छी आए।
याद रखे “परहेज ईलाज से बेहतर” है।

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