दुनियाभर में बढ़ रही है ध्यान योग की स्वीकार्यता!

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पतंजलि के योगसूत्र से लेकर गीता के उपदेश तक हर जगह ध्यान को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। अभी तक कुछ लोग योग आसनों को ही ध्यान समझते रहे हैं, लेकिन देश दुनिया मे राजयोग के माध्यम से स्वयं को देहभान से परे कर आत्मस्वरूप में रहकर परमात्मा के प्रति ध्यान लगाने की विधि को ब्रह्माकुमारीज़ संस्था ने ही पहुंचाया है। शारिरिक आसन के द्वारा हम अपने शरीर को मजबूत करने के साथ ही रोग मुक्त बना सकते हैं, ताकि ध्यान लगाकर हम एक साथ तन-मन को लाभ पहुंचा सकते है। हमारा शरीर एक जगह पर स्थिर हो और ध्यान की प्रक्रिया आसानी से हो सके इसके लिए श्रीमद् भगवद् गीता में ध्यान को लेकर महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं, और साथ ही इससे होने वाले लाभ का भी गीता में उल्लेख किया गया है।  

भगवद् गीता में ध्यान को एक योगक्रिया माना गया है। जो आपको आत्म अनुशासन की ओर ले जाता है। निरंतर इसका अभ्यास करने से एकाग्रता बढ़ती है, तनाव से मुक्ति मिलती है। मानसिक स्थिरता और संतुलन भी ध्यान करने से प्राप्त होता है। विकारों से मुक्ति पाने और मन की निर्मलता के लिए भी ध्यान किया जाता है। ध्यान जब गहन होने लगता है तो व्यक्ति को समाधि की प्राप्त होने लगती है। ध्यान के जरिए आत्मा का परमात्मा से मिलन ही ब्रह्माकुमारीज़ का राजयोग है। यानि ध्यान वह योग प्रक्रिया है जिसके जरिये हम स्वयं पर सिद्धि प्राप्त करते हैं। ध्यान करने वाले व्यक्ति का मन नियंत्रित रहता है और वो वर्तमान में जीता है। मानसिक और शारीरिक स्थिरता को ही ध्यान कहा जा जाता है।

गीता के पंचम और षष्ठम अध्याय में योग करने की सही विधि की जानकारी हमको मिलती है। श्रीकृष्ण ने परमात्म निमित्त बन अर्जुन को महाभारत के युद्ध के समय बताया है कि, कैसे मन और इंद्रियों को वश में करने के लिए ध्यान क्रिया की जानी चाहिए। गीता के अनुसार, ध्यान करने के लिए सबसे पहले किसी शुद्ध स्थान पर आसन बिछाकर बैठना चाहिए। हालांकि इस बात का ध्यान रखें कि, ना ही स्थान बहुत ऊंचा हो और ना ही बहुत नीचे। आसन पर बैठने के बाद अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करनी चाहिए और इंद्रियों और मन को नियंत्रिण में लाने का अभ्यास करना चाहिए। ध्यान करने के लिए सिर व गले को समान और अचल रखते हुए सुखासन में योगी को बैठना चाहिए। बाहरी चीजों से ध्यान को हटाकर नासिका के अग्र भाग यानि दोनों भौहों के बीच जहां आत्मा निवास करती है,के प्रति ध्यान केंद्रित करना चाहिए। तत्पश्चात सभी प्रकार के विषयों से मन को हटाकर नेत्रों को भृकुटी के मध्य में स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए। इसके बाद प्राण और अपान वायु को सम करना चाहिए। 

इसके बाद मन के सभी विकारों से दूर होकर, उत्तेजनारहित और शांति के साथ ध्यान और ईश्वर के चिंतन में बैठे रहना चाहिए। इस तरह से निर्मल और निर्विकार व्यक्ति परमतत्व का ध्यान करते हुए आनंद की अंतिम सीमा को प्राप्त करता है और उसे शांति मिलती है। गीता के अनुसार, ध्यान उसका ही सिद्ध होता है, जो न अधिक खाता है और ना ही अधिक भूखा रहता है। अधिक जगाने या सोने वाले को भी ध्यान की सिद्धि प्राप्त नहीं होती। सुख में अत्यधिक खुश और दुख में ज्यादा दुखी होने वाला व्यक्ति भी ध्यान को सिद्ध नहीं कर पाता। गीता में बताया गया है कि, जो व्यक्ति उचित आहार-विहार करता है, उसी को ध्यान-योग में सिद्धि प्राप्त होती है।

गीता में बताई गई इन शिक्षाओं को जीवन में आजमाकर हम ध्यान कर सकते हैं और मानसिक शांति पा सकते हैं। ध्यान करने से हमको न केवल मानसिक शक्ति मिलती है, बल्कि अपने लक्ष्यों को भी हम पा सकते हैं। ध्यान हमारी एकाग्रता को बढ़ाता है और हम अपना शतप्रतिशत अपने लक्ष्य को दे पाते हैं। इसके साथ ही एक आदर्श और व्यवस्थित समाज भी ध्यान के जरिए हम स्थापित कर सकते हैं। ध्यान मानसिक और शारीरिक विकारों को दूर करता है, यानि स्वस्थ जीवन जीने के लिए भी ध्यान करना अति आवश्यक है। इस वर्ष विश्व ध्यान दिवस की थीम ‘आंतरिक शांति, वैश्विक सद्भाव’ है। पतंजलि के योगसूत्र से लेकर गीता के उपदेश तक हर जगह ध्यान को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में कोर समूह के अन्य देशों के साथ मिल कर भारत ने 21 दिसंबर को विश्व ध्यान दिवस के रूप में घोषित करने के प्रस्ताव को स्वीकार किया है। वास्तव में ध्यान मानसिक तथा शारीरिक विकारों को दूर करने में कारगर होने के साथ ही यह स्वस्थ जीवन जीने के लिए भी प्रेरित करता है। विश्व ध्यान दिवस को एक अंतरराष्ट्रीय उत्सव भी हम कह सकते है, जिसमें शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक कल्याण के लिए ध्यान का अभ्यास करने का संकल्प लिया गया है। भारत के साथ श्रीलंका, नेपाल, मैक्सिको, लिकटेंस्टीन और अंडोरा जैसे  193 सदस्यीय देशो ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘विश्व ध्यान दिवस’ के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित करने में अहम भूमिका निभाई । जिसे आत्मसात करने के लिए 140 देशो की अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था ब्रह्माकुमारीज़  ने एक सार्थक पहल की है। ब्रह्माकुमारीज़ का उद्देश्य  दुनिया मे शांति को बहाल करना है। इसके लिए, यह संस्था लोगों को सहज राजयोग की विधि सिखाती है। साथ ही ब्रह्माकुमारीज़ के ज़रिए लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान भी दिया जाता है। इसी ईश्वरीय ज्ञान के जरिए युग परिवर्तन होना अवश्यसम्भावी है। (लेखक आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ साहित्यकार है)

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