चंपावत दुष्कर्म प्रकरण में पुलिस जांच में साजिश का दावा

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चंपावत के चर्चित नाबालिग दुष्कर्म प्रकरण में पुलिस जांच ने बड़ा मोड़ ले लिया है। शुरुआती आरोपों के बाद जहां प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन हुए, कांग्रेस समेत कई संगठनों ने सरकार और पुलिस प्रशासन को घेरा, वहीं अब एसआईटी की वैज्ञानिक और तकनीकी जांच में कथित साजिश की बात सामने आई है। पुलिस मुख्यालय की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, घटना में नामजद तीनों आरोपियों की मौजूदगी घटनास्थल पर नहीं पाई गई, जबकि सीसीटीवी फुटेज, सीडीआर और फॉरेंसिक साक्ष्यों में कई तथ्य शुरुआती आरोपों से मेल नहीं खाते। जांच में बदले की भावना से नाबालिग को बहला-फुसलाकर घटनाक्रम रचने की आशंका जताई गई है। पुलिस का कहना है कि डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों की विस्तृत जांच जारी है तथा यदि आरोप भ्रामक पाए गए तो संबंधित लोगों के खिलाफ भी सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। दिव्य हिमगिरि रिपोर्ट

चंपावत में कथित दुष्कर्म मामले को लेकर पिछले कुछ दिनों से प्रदेशभर में माहौल गरमाया हुआ था। नाबालिग के साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोप सामने आने के बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश देखने को मिला। राजधानी देहरादून समेत चंपावत और अन्य जिलों में विरोध प्रदर्शन हुए, आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग उठी और कानून-व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए गए। कांग्रेस नेताओं ने इस मामले को गंभीर बताते हुए सरकार और पुलिस प्रशासन को घेरा, जबकि कई संगठनों ने पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग को लेकर प्रदर्शन किए। इसी बीच अब इस पूरे मामले में उत्तराखंड पुलिस की जांच ने नया मोड़ ला दिया है। पुलिस मुख्यालय की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि शुरुआती जांच और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर मामला कथित तौर पर एक सुनियोजित साजिश के रूप में सामने आया है। पुलिस के अनुसार बदले की भावना से प्रेरित होकर नाबालिग को बहला-फुसलाकर पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया गया। मामले की शुरुआत 6 मई 2026 को हुई थी, जब एक व्यक्ति ने कोतवाली चंपावत में लिखित तहरीर देकर आरोप लगाया कि 5 मई की रात उसकी 16 वर्षीय पुत्री के साथ तीन लोगों ने दुष्कर्म किया। मामला नाबालिग से जुड़ा होने के कारण पुलिस ने तत्काल पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया और जांच शुरू कर दी।
घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक चंपावत रेखा यादव ने तत्काल दस सदस्यीय एसआईटी का गठन किया। क्षेत्राधिकारी चंपावत की निगरानी में गठित टीम को निष्पक्ष और गहन जांच के निर्देश दिए गए। एसपी स्वयं पीड़िता से मिलीं, घटनास्थल का निरीक्षण किया और स्थानीय लोगों से बातचीत कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी जुटाई। पुलिस टीम ने मौके से साक्ष्यों को सुरक्षित किया और रुद्रपुर स्थित आरएफएसएल फील्ड यूनिट को बुलाकर वैज्ञानिक परीक्षण कराया। साथ ही पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराया गया, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के समक्ष काउंसिलिंग कराई गई और न्यायालय में बयान दर्ज कराए गए। नाबालिग की सुरक्षा और देखरेख के लिए प्रशासन की ओर से मजिस्ट्रेट भी नियुक्त किया गया। जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा और अन्य डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण किया। पुलिस के मुताबिक विवेचना में कई ऐसे तथ्य सामने आए जो शुरुआती आरोपों से मेल नहीं खाते। पुलिस जांच में सामने आया कि घटना वाले दिन नाबालिग एक विवाह समारोह में अपनी इच्छा से अपने दोस्त के साथ गई थी। सीसीटीवी फुटेज और तकनीकी साक्ष्यों से उसके विभिन्न स्थानों पर आने-जाने की पुष्टि हुई। वहीं मेडिकल परीक्षण में किसी प्रकार की बाहरी या अंदरूनी चोट, संघर्ष या जबरदस्ती के स्पष्ट संकेत नहीं मिले। विवेचना के दौरान कुछ गवाहों के बयान भी तकनीकी साक्ष्यों से मेल नहीं खाए। पुलिस का कहना है कि कई परिस्थितिजन्य तथ्य कथित घटना की पुष्टि नहीं करते। जांच में यह भी सामने आया कि कमल रावत नामक व्यक्ति, पीड़िता और उसकी महिला मित्र के बीच घटना के दिन असामान्य रूप से कई बार बातचीत हुई थी। पुलिस इसे पूरे घटनाक्रम से जुड़ा अहम संकेत मान रही है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि जिन तीन लोगों को नामजद किया गया था, विनोद सिंह रावत, नवीन सिंह रावत और पूरन सिंह रावत उनकी मौजूदगी कथित घटनास्थल पर नहीं पाई गई। पुलिस का दावा है कि तकनीकी साक्ष्य और गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट हुआ कि घटना के समय तीनों आरोपी मौके पर थे ही नहीं।

कांग्रेस नेताओं ने चंपावत में धरना-प्रदर्शन किए और देहरादून में भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला

मामले के शुरुआती खुलासे के बाद प्रदेश में राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया था। कांग्रेस नेताओं ने चंपावत में धरना-प्रदर्शन किए और देहरादून में भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला। कई महिला संगठनों और छात्र संगठनों ने आरोपियों की गिरफ्तारी और फास्ट ट्रैक जांच की मांग उठाई। सोशल मीडिया पर भी मामला तेजी से वायरल हुआ और लोगों ने कठोर कार्रवाई की मांग की।
हालांकि अब पुलिस की नई जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद पूरे घटनाक्रम ने अलग दिशा पकड़ ली है। पुलिस मुख्यालय का कहना है कि जांच पूरी तरह वैज्ञानिक और निष्पक्ष तरीके से की जा रही है ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को प्रताड़ित न होना पड़े और वास्तविक दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित हो सके। पुलिस के अनुसार जांच में “मोडस ऑपरेंडी” के तौर पर यह बात सामने आई है कि कमल रावत ने बदले की भावना से प्रेरित होकर कथित षड्यंत्र रचा। आरोप है कि उसने नाबालिग को बहला-फुसलाकर पूरे घटनाक्रम को एक सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया ताकि व्यक्तिगत दुश्मनी निकाली जा सके। फिलहाल पुलिस डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों की विस्तृत जांच कर रही है। संबंधित लोगों से पूछताछ जारी है और अन्य तकनीकी प्रमाण जुटाए जा रहे हैं। पुलिस ने साफ कहा है कि यदि जांच में आरोप भ्रामक या मनगढ़ंत पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानून के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी।
उत्तराखंड पुलिस ने यह भी दोहराया कि महिला और बाल अपराधों के मामलों में “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाई जाती है। साथ ही यह संदेश भी दिया गया कि झूठे आरोप या भ्रामक सूचनाएं भी कानून की नजर में गंभीर अपराध हैं और ऐसे मामलों में भी कठोर कार्रवाई होगी। अब पूरे प्रदेश की नजर इस हाई-प्रोफाइल मामले की अंतिम जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है। एक ओर जहां शुरुआती आरोपों ने समाज और राजनीति में भारी उबाल पैदा किया, वहीं अब पुलिस की जांच ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में फॉरेंसिक रिपोर्ट और आगे की विवेचना इस मामले की तस्वीर पूरी तरह साफ कर सकती है।
वहीं विरोध प्रदर्शनों के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से इस मामले पर कोई अलग विस्तृत सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन सरकार पहले से महिला अपराधों पर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की बात दोहराती रही है। वहीं पुलिस मुख्यालय ने भी साफ किया है कि महिला एवं बाल अपराधों के मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं बरती जाएगी और निष्पक्ष जांच के आधार पर ही कार्रवाई होगी।

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