2011 के बाद देश की आबादी में कितना इजाफा हुआ है, इसका पता लगाने के लिये जनगणना कर्मी 22 मई से लोगों के घर पहुंचना शुरू कर देंगे। आजादी के बाद यह आठवीं जनगणना है। इससे पहले 1951, 1961, 1971, 1981, 1991, 2001, 2011 में भी जनगणना का कार्य हो चुका है। 2021 में कोरोना महामारी के चलते जनगणना का काम नहीं हो पाया था, जो अब 2026 में सम्पन्न होने जा रहा है। जनगणना के लिये सरकार को काफी व्यय और व्यवस्था करनी पड़ती है। इसलिये आम हिन्दुस्तानी भी बाध्य है कि वह जनगणना कर्मी को सही तथ्य और जानकारी प्रदान करें। यदि जनगणना के दौरान कोई पुरुष/महिला किसी तथ्य को जानबूझकर छिपाता/छिपाती है, तो इसका अंजाम सही नहीं होगा। ऐसे लोगों पर जुर्माना लगाया जा सकता है और जेल भी भेजा जा सकता है। मतलब जनगणना कर्मी से कुछ भी छिपाना अब हल्की बात नहीं मानी जाएगी। जनगणना अधिनियम, 1948 के प्रावधानों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत जानकारी देता है, कोई तथ्य छिपाता है या जनगणना से जुड़े दायित्व का पालन नहीं करता, तो उस पर दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है। अधिनियम की धारा 11 के तहत ऐसे मामलों में एक हजार रुपये तक का जुर्माना और तीन साल तक की सजा का प्रावधान है। यही नहीं, यह प्रावधान केवल उत्तरदाता पर ही नहीं, बल्कि प्रगणक पर भी समान रूप से लागू होता है। यदि प्रगणक अपने काम के दौरान मिली जानकारी को बाहर किसी से साझा करता है, तो आरोप साबित होने की स्थिति में उस पर भी कार्रवाई हो सकती है।
जनगणना से जुड़ी इस कानूनी व्यवस्था को लेकर इन दिनों प्रगणक और पर्यवेक्षक भी खासे सतर्क हो गए हैं। स्वगणना के दौरान कुछ लोगों द्वारा जानकारी छिपाने या अधूरी जानकारी देने की चर्चाओं ने जनगणना से जुड़े अमले को और अधिक सावधान कर दिया है। अधिकारियों का मानना है कि जनगणना केवल औपचारिक आंकड़ा जुटाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके आधार पर सरकारें योजनाएं बनाती हैं, संसाधन तय करती हैं और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन करती हैं। ऐसे में अगर किसी स्तर पर जानकारी गलत दर्ज होती है या जानबूझकर छिपाई जाती है, तो उसका असर पूरी व्यवस्था पर पड़ सकता है। प्रगणकों को निर्देश दिया जा रहा है कि वे घर-घर जाकर दर्ज की जाने वाली सूचनाओं को पूरी गंभीरता से सत्यापित करें। खासकर हाउस लिस्टिंग ब्लॉक में किसी भी तरह की अनियमितता मिलने पर जिम्मेदारी सीधे प्रगणक पर आ सकती है। प्रशासनिक स्तर पर यह माना जा रहा है कि यदि किसी ब्लॉक में परिवारों की संख्या, लोगों की संख्या या अन्य बुनियादी विवरण असामान्य रूप से कम पाए जाते हैं, तो यह संदेह का कारण बन सकता है। ऐसी स्थिति में पुनरीक्षण कराया जा सकता है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
जनगणना का सबसे बड़ा आधार विश्वास है। सरकार को सही आंकड़े चाहिए और नागरिकों को यह भरोसा होना चाहिए कि दी गई जानकारी सुरक्षित रहेगी। यही कारण है कि जनगणना से जुड़े कर्मचारियों को गोपनीयता के नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है। जनगणना में एकत्र की गई सूचनाएं व्यक्तिगत स्तर पर संवेदनशील मानी जाती हैं। किसी भी प्रगणक द्वारा इन तथ्यों को बाहर साझा करना कानून के दायरे में गंभीर लापरवाही माना जाता है। यदि यह साबित हो जाता है कि किसी कर्मचारी ने जानकारी लीक की, तो उसके खिलाफ दंडात्मक प्रावधान लागू हो सकते हैं। इस बार स्वगणना को लेकर भी विशेष चर्चा बनी हुई है। स्वगणना में लोग स्वयं अपने बारे में और अपने परिवार के बारे में जानकारी दर्ज करते हैं। लेकिन यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर कुछ तथ्य छिपा देता है, तो इसका असर अंतिम आंकड़ों पर पड़ता है। कुछ मामलों में लोग आय, शिक्षा, परिवार के सदस्यों की संख्या, निवास की स्थिति या अन्य सामाजिक जानकारी को अधूरा छोड़ देते हैं। ऐसी हरकतें भले ही व्यक्तिगत स्तर पर छोटी लगें, लेकिन जब यह हजारों-लाखों घरों में होती हैं, तो राष्ट्रीय आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
इसी वजह से प्रगणकों को यह भी कहा जा रहा है कि वे केवल फॉर्म भरवाने तक सीमित न रहें, बल्कि जानकारी की संगति भी देखें। अगर किसी घर में लोगों की संख्या बहुत कम दिखाई देती है, जबकि आसपास की परिस्थिति कुछ और संकेत देती है, तो उसे तुरंत चिह्नित किया जा सकता है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी घर में रहने वाले लोग बाहर चले गए हों, या किसी सदस्य का नाम जानबूझकर दर्ज न कराया गया हो। ऐसे मामलों में पुनरीक्षण की प्रक्रिया अपनाकर वास्तविक तथ्य जुटाए जा सकते हैं। प्रशासन का कहना है कि संदेह के आधार पर जांच कराना जनगणना की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है। हाउस लिस्टिंग ब्लॉक के स्तर पर यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही जनगणना की प्राथमिक इकाई मानी जाती है। इसी स्तर पर मकानों, परिवारों और निवासियों का प्रारंभिक रिकॉर्ड तैयार होता है। यदि यही रिकॉर्ड गलत या अधूरा हो गया, तो आगे के सभी आंकड़ों में त्रुटि आ सकती है। इसलिए प्रगणकों को साफ निर्देश हैं कि वे किसी भी तरह की लापरवाही न बरतें। यदि किसी ब्लॉक में ज्यादा अनियमितता मिलती है, तो इसकी जवाबदेही तय की जाएगी। इससे न केवल संबंधित प्रगणक की भूमिका सवालों के घेरे में आएगी, बल्कि पर्यवेक्षण व्यवस्था पर भी प्रश्न उठ सकते हैं।
अधिकारियों का मानना है कि जनगणना के काम में सतर्कता सिर्फ नियमों की वजह से नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित की वजह से भी जरूरी है। देश की योजनाएं, विकास कार्य, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा सुविधाएं, रोजगार से जुड़े आकलन और कई तरह के संसाधन वितरण जनगणना के आंकड़ों पर निर्भर करते हैं। यदि किसी क्षेत्र की वास्तविक जनसंख्या कम दिखाई जाती है, तो वहां मिलने वाले संसाधनों पर असर पड़ सकता है। इसी तरह यदि किसी समुदाय, बस्ती या इलाके की सही गिनती नहीं हुई, तो वे लाभ से वंचित रह सकते हैं। इसलिए जनगणना अमले को यह समझाया जा रहा है कि हर विवरण की अहमियत है। एक गलत प्रविष्टि भी पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। यही वजह है कि प्रगणक, पर्यवेक्षक और संबंधित अधिकारी अब अधिक चौकन्ने हो गए हैं। वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जनता भी सहयोग करें और सही जानकारी दे। जनगणना को लेकर किसी तरह की अफवाह, डर या लापरवाही से बचना होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि जनगणना केवल सरकारी दस्तावेज नहीं, बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक वास्तविकता का आईना है। इसमें जितनी सच्चाई होगी, नीति निर्माण उतना ही मजबूत होगा। अगर लोग अपनी जानकारी छिपाते हैं, तो वे सिर्फ नियम का उल्लंघन नहीं करते, बल्कि अपने इलाके और समुदाय के हिस्से के अधिकारों को भी कमजोर कर सकते हैं। इसी तरह यदि जनगणना कर्मी गोपनीयता भंग करते हैं, तो वे पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हैं। प्रशासन अब यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि हर स्तर पर निगरानी सख्त रहे। प्रगणकों को बार-बार निर्देश दिए जा रहे हैं, पर्यवेक्षक क्षेत्रीय जांच कर रहे हैं और जहां भी आंकड़ों में असामान्यता दिख रही है, वहां पुनर्परीक्षण की तैयारी है। अधिकारियों की कोशिश है कि किसी भी तरह की कमी पहले ही पकड़ ली जाए, ताकि अंतिम आंकड़े अधिक सटीक और भरोसेमंद हों। जनगणना की सफलता इसी बात पर टिकी है कि न तो कोई तथ्य छूटे, न कोई गलत दर्ज हो और न ही कोई संवेदनशील जानकारी बाहर जाए।





