आप पर अपनों ने ही चलाई “झाड़ू”

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आम आदमी पार्टी के भीतर उठा सियासी तूफान खुलकर सामने आ गया । पार्टी के प्रमुख और प्रभावशाली चेहरों में शामिल राघव चड्ढा ने अपने छह राज्यसभा साथियों के साथ अचानक इस्तीफा देकर न सिर्फ संगठन को बड़ा झटका दिया है, बल्कि राजनीतिक समीकरण भी बदल दिए हैं। उनके साथ संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रम साहनी, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह और राजिंदर गुप्ता जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं। 24 अप्रैल को कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस फैसले का ऐलान करते हुए चड्ढा ने साफ कहा कि पार्टी अब अपने मूल सिद्धांतों और विचारधारा से भटक चुकी है। उन्होंने दावा किया कि राज्यसभा में आप के दो-तिहाई सांसद उनके साथ हैं और वे संविधान के प्रावधानों के तहत भाजपा में विलय की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं। इस घटनाक्रम ने आप के भीतर गहरी दरार को उजागर कर दिया है और साफ संकेत दिया है कि पार्टी के भीतर असंतोष अब बगावत में बदल चुका है, जिसका सीधा सियासी फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है। शंभू नाथ गौतम, वरिष्ठ पत्रकार

आम आदमी पार्टी की सियासत इन दिनों अपने सबसे बड़े अंदरूनी संकट से गुजरती दिख रही है। एक ऐसा संकट, जिसने न सिर्फ पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को झकझोर दिया है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी नए समीकरणों की आहट पैदा कर दी है। बीते कुछ वर्षों में आप ने जिस तेजी से अपनी पहचान बनाई, उसी तेजी से अब उसके भीतर दरारें भी गहराती नजर आ रही हैं। शुक्रवार, 24 अप्रैल को जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इस सियासी हलचल को सार्वजनिक कर दिया। पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल राघव चड्ढा का अपने छह राज्यसभा साथियों के साथ अचानक इस्तीफा देना केवल एक संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इस फैसले ने यह साफ कर दिया कि पार्टी के भीतर असंतोष अब उस स्तर तक पहुंच चुका है, जहां संवाद की गुंजाइश खत्म होती दिख रही है। दिल्ली से लेकर पंजाब और राष्ट्रीय स्तर तक आप ने खुद को एक वैकल्पिक राजनीतिक ताकत के रूप में पेश किया था। लेकिन अब वही पार्टी अपने ही नेताओं के असंतोष और अलगाव की कहानी बनती नजर आ रही है। चड्ढा के साथ संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रम साहनी, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह और राजिंदर गुप्ता जैसे नामों का एक साथ पार्टी छोड़ना इस बात का संकेत है कि यह फैसला व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक असहमति का परिणाम है। कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चड्ढा ने जिस तरह से पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाए, उसने पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना दिया। उन्होंने साफ कहा कि आप अब अपने मूल सिद्धांतों और विचारधारा से भटक चुकी है। उनके मुताबिक, जिस राजनीति के आदर्शों के साथ उन्होंने पार्टी जॉइन की थी, वह अब कहीं पीछे छूट चुके हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक के बाद एक बड़े चेहरों का पार्टी से अलग होना यह दिखाता है कि संगठन के भीतर संवाद और संतुलन की कमी रही है। पहले भी कई संस्थापक और वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके हैं, लेकिन इस बार मामला सीधे संसद तक पहुंच गया है, जो आप के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा करता है। 25 अप्रैल तक आते-आते इस घटनाक्रम ने और रफ्तार पकड़ ली। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी छोड़ने वाले सांसदों ने औपचारिक रूप से अपने निर्णय की जानकारी राज्यसभा अध्यक्ष को दे दी है। इसके साथ ही उन्होंने संविधान के तहत भाजपा में विलय की प्रक्रिया शुरू करने का दावा भी किया है। अगर यह प्रक्रिया पूरी होती है, तो यह आप के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ सत्ता या पद का मामला नहीं है, बल्कि पार्टी की आंतरिक संरचना और नेतृत्व शैली से जुड़ा हुआ है। कई नेताओं को लंबे समय से निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और केंद्रीय नेतृत्व के बढ़ते नियंत्रण को लेकर आपत्ति थी। यह असंतोष धीरे-धीरे बढ़ता गया और अब एक बड़े विस्फोट के रूप में सामने आया है। इस घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे भाजपा को सीधा राजनीतिक लाभ मिलता नजर आ रहा है। जहां आप अपने अंदरूनी संकट से जूझ रही है, वहीं भाजपा इसे अपने विस्तार के अवसर के रूप में देख रही है। खासकर राज्यसभा में संख्या बल के लिहाज से यह बदलाव आने वाले समय में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

अंदरूनी नाराजगी, अनदेखी और टकराव ने बढ़ाई दूरी

आम आदमी पार्टी में हाल ही में हुए बड़े सियासी घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर असंतोष लंबे समय से पनप रहा था। अचानक सात राज्यसभा सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना कोई एक दिन का फैसला नहीं, बल्कि कई महीनों से चल रही नाराजगी, अनदेखी और नेतृत्व से टकराव का नतीजा है। पार्टी के भीतर संवाद की कमी, जिम्मेदारियों में बदलाव और व्यक्तिगत मतभेद धीरे-धीरे इतने गहरे हो गए कि आखिरकार यह बगावत के रूप में सामने आया। आप की तेजी से बढ़ती राजनीति के बीच संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना चुनौती बन गया था। कई वरिष्ठ नेताओं को लगा कि उनकी भूमिका सीमित कर दी गई है और निर्णय प्रक्रिया में उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। यही कारण है कि अलग-अलग कारणों से नाराज चल रहे नेताओं ने एक साथ बड़ा कदम उठा लिया। राघव चड्ढा- राघव चड्ढा की नाराजगी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ रिश्तों में आई खटास से जुड़ी बताई जा रही है। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय उनकी चुप्पी और विदेश में रहने को लेकर पहले ही सवाल उठे थे। इसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में डिप्टी लीडर पद से हटा दिया और उन्हें बोलने का समय भी कम मिलने लगा। पार्टी के भीतर उनके खिलाफ माहौल बनने से वे खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे, जिसने उनके फैसले को प्रभावित किया। संदीप पाठक- डॉ. संदीप पाठक लंबे समय तक पार्टी की रणनीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाते रहे। पंजाब, गोवा और गुजरात में संगठन को मजबूत करने में उनका बड़ा योगदान रहा। लेकिन हाल के समय में उन्हें प्रमुख बैठकों और फैसलों से दूर रखा जाने लगा। पंजाब की जिम्मेदारी उनसे लेकर दूसरे नेता को सौंपना भी उनकी नाराजगी की बड़ी वजह बना। स्वाति मालीवाल- स्वाति मालीवाल का विवाद सीधे शीर्ष नेतृत्व से जुड़ा रहा। उन्होंने वैभव कुमार पर गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। इसके बाद से उनका पार्टी से मोहभंग बढ़ता गया और वे सार्वजनिक रूप से भी विरोध जताने लगीं। अशोक मित्तल- अशोक मित्तल को राज्यसभा में अहम जिम्मेदारी मिलने के बावजूद, जब उनके ठिकानों पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई हुई तो पार्टी का समर्थन न मिलना उनके लिए बड़ा झटका साबित हुआ। इस दौरान खुद को अकेला महसूस करने की वजह से उन्होंने दूरी बना ली। हरभजन सिंह- हरभजन सिंह को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के बाद भी पार्टी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका नहीं मिली। उन्हें निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा गया, जिससे वे लगातार अलग-थलग महसूस करते रहे। राजिंदर गुप्ता- राजिंदर गुप्ता, जो उद्योग जगत से जुड़े बड़े नाम हैं, पार्टी में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सके। राज्यसभा सदस्य बनने के बावजूद उन्हें संगठनात्मक स्तर पर ज्यादा जिम्मेदारी नहीं दी गई, जिससे उनकी दूरी बढ़ती गई। विक्रमजीत सिंह साहनी- विक्रमजीत सिंह साहनी भी लंबे समय से पार्टी में सक्रिय थे, लेकिन उन्हें भी पार्टी फोरम में अपेक्षित महत्व नहीं मिला। यही कारण रहा कि उन्होंने भी पार्टी छोड़ने का फैसला किया। कुल मिलाकर, इन सभी नेताओं के अलग-अलग कारण जरूर रहे, लेकिन एक बात समान रही, पार्टी के भीतर संवाद की कमी और नेतृत्व से बढ़ती दूरी। यही कारण है कि यह सामूहिक इस्तीफा आप के लिए अब तक का सबसे बड़ा सियासी झटका बन गया है।

एक दिन में बदली सियासत, आप के सामने सबसे बड़ी चुनौती

भाजपा की ओर से अभी औपचारिक बयान भले सीमित हो, लेकिन अंदरखाने इस घटनाक्रम को लेकर सक्रियता बढ़ गई है। दूसरी ओर, आप के लिए यह समय आत्ममंथन का है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने संगठन को कैसे संभाले और कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास बनाए रखे। लगातार हो रहे पलायन से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पार्टी अपने मूल एजेंडे और विचारधारा को बनाए रखने में सफल रही है या नहीं।पार्टी के कुछ नेताओं ने इस घटनाक्रम को “राजनीतिक अवसरवाद” बताया है, जबकि अन्य इसे “अंदरूनी असंतोष का परिणाम” मान रहे हैं। हालांकि, सच्चाई जो भी हो, इतना तय है कि इस घटनाक्रम ने आप की छवि पर असर डाला है। सोशल मीडिया और जनमानस में भी इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जहां एक वर्ग इसे पार्टी की कमजोरी के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मान रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आप इस संकट से उबरकर खुद को फिर से मजबूत कर पाती है या यह घटनाक्रम उसके लिए एक लंबी राजनीतिक चुनौती बन जाता है। वहीं भाजपा के लिए यह एक अवसर है, जिससे वह अपने प्रभाव को और मजबूत कर सकती है। 24 और 25 अप्रैल के बीच हुए इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि भारतीय राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं है। एक दिन में हालात कैसे बदल सकते हैं, इसका यह ताजा उदाहरण है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आगे की रणनीति क्या होगी और यह सियासी उठापटक किस दिशा में जाएगी।

सांसदों के पाला बदलने पर गरमाई सियासत, केजरीवाल ने बताया ‘पंजाब के साथ धोखा’

आम आदमी पार्टी में सात राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम पर अब पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहा कि यह कदम पंजाब और पंजाबियों के साथ बड़ा धोखा है।केजरीवाल ने अपने संदेश में आरोप लगाया कि यह सब योजनाबद्ध तरीके से किया गया है और इसका उद्देश्य पंजाब की राजनीति को प्रभावित करना है। उन्होंने साफ कहा कि जनता ऐसे कदम उठाने वालों को कभी माफ नहीं करेगी। पार्टी की ओर से भी कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि पंजाब के जनादेश के साथ विश्वासघात है। उन्होंने कहा कि जनता इसका जवाब समय आने पर जरूर देगी। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिलने का समय मांगा है। सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री मान सभी विधायकों के साथ दिल्ली जाकर राष्ट्रपति से मुलाकात करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि इस मुलाकात में पार्टी बदलने वाले सांसदों के खिलाफ ‘राइट टू रिकॉल’ की मांग उठाई जाएगी। मुख्यमंत्री मान इस मुद्दे पर विस्तार से अपना पक्ष रखेंगे और संवैधानिक कार्रवाई की मांग करेंगे। दूसरी ओर, पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह भी उपराष्ट्रपति से मिलने की तैयारी में हैं। वह उन सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग करेंगे, जिन्होंने पार्टी छोड़ी है। हालांकि, पार्टी के कुछ नेताओं का दावा है कि सभी सात सांसदों ने अभी आधिकारिक रूप से पक्ष नहीं बदला है। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा और संजय सिंह ने कहा कि फिलहाल केवल तीन सांसद ही भाजपा में शामिल हुए हैं, जबकि बाकी चार अब भी आम आदमी पार्टी के सदस्य हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी इसे विश्वासघात बता रही है, वहीं दूसरी ओर आगे की कानूनी और राजनीतिक लड़ाई के संकेत भी साफ नजर आ रहे हैं।

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