अनुशासन, समर्पण और निरंतर सीखने की भावना ही है स्थायी सफलता के वास्तविक स्तंभ: डॉ. तृप्ति

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1- अपनी पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएं।
मेरा जन्म पटना के एक उच्च शिक्षित परिवार में हुआ है। मैंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा राजेंद्र विद्यालय, जमशेदपुर, झारखंड से पूर्ण की। शिक्षा के प्रति मेरी शुरू से ही गहरी लगन रही है। श्री बी.एम. पाटिल मेडिकल कॉलेज, बीजापुर से एमबीबीएस, केम्पेगौड़ा इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, बैंगलुरु से नेत्र विभाग में डिप्लोमा तथा वीएनआई इंस्टिट्यूट, दिल्ली से डीएनबी की डिग्री पूर्ण की।

2- चिकित्सा क्षेत्र में आने के प्रेरणास्रोत कौन रहे हैं?
चिकित्सा के क्षेत्र में आने के मेरे प्रेरणास्रोत मेरे माता-पिता श्रीमती किरण चौधरी एवं श्री बुद्धिनाथ चौधरी रहे हैं। चूंकि पारिवारिक पृष्ठभूमि उच्च शिक्षा से परिपूर्ण है, लिहाजा मेरे परिजन चाहते थे कि मैं एक चिकित्सक के रूप में समाज की सेवा करने में अपना योगदान दूं। एक नेत्र रोग विशेषज्ञ और परफेक्शनिस्ट के रूप में मेरा मानना है कि अनुशासन, समर्पण और निरंतर सीखने की भावना ही स्थायी सफलता के वास्तविक स्तंभ हैं।

3- आपकी उपलब्धियों के बारे में बताइए।
मैंने दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में इंटर्नशिप की तथा डॉ. एनसी जोशी मेमोरियल कॉलेज में एक रेजिडेंट के रूप में ढाई वर्ष कार्य किया। गौतम बुद्ध चिकित्सा महाविद्यालय, देहरादून में 5 वर्ष कार्य ऑप्थाल्मोलॉजी सर्जन (रेटिना स्पेशलिस्ट) के रूप में कार्य किया तथा वर्तमान में शिव चिकित्सालय, देहरादून में एक सीनियर कंसल्टेंट के पद पर कार्यरत हूं। मेरे द्वारा अब तक अनेक मरीजों का सफल नेत्र ऑपरेशन कर उनकी नेत्र ज्योति को वापस दिलाया गया है। इसके अलावा मैं नवजात शिशु आरओपी स्क्रीनिंग में भी पारंगत हूं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR), नई दिल्ली द्वारा 2009 में शॉर्ट टर्म स्टूडेंटशिप अवार्ड 2009 से सम्मानित किया गया।

4- चिकित्सा के क्षेत्र में आपका कोई यादगार अनुभव।
जब मैं दिल्ली में कार्यरत थी, तब एक 15 साल की लड़की, जिसकी शुगर की वजह से दोनों आंखों में मोतियाबिंद हो गया था, का सफल ऑपरेशन किया था। ऑपरेशन के बाद जब उसकी आंखों की पट्टी खोली गई, तो वह खुशी की वजह से रोने लगी, जिससे पूरे अस्पताल का माहौल भावुक हो गया था। इसके अलावा मैंने अपने एक मरीज की आंखों का सफल ऑपरेशन किया था और इसके बाद जब उसकी नौकरी लगी, तो वह मुझसे मिलने आया, लेकिन उसकी वेशभूषा इतनी बदल चुकी थी कि मैं उसको पहली बार में पहचान ही नहीं पाई। इस तरह के मेरे सामने कई अवसर ऐसे आएं और तब मुझे लगा कि यदि हम अपना कार्य ईमानदारी और कुशलतापूर्वक करें, तो हम लोगों के जीवन की दिशा ही बदल सकते हैं।

5- दिव्य हिमगिरि के पाठकों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगी?
पाठकों के लिए मेरा संदेश है कि निरंतर मेहनत एवं लगन से आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। अशांति और तनाव के इस दौर में मैं सभी पाठकों को गीता के श्लोकों को अपने जीवन में उतारने का निवेदन करती हूं। हमारा जीवन इस पृथ्वी पर निर्धारित है और सेवा ही परम धर्म है। इसके अलावा आंखें अनमोल हैं, इसका विशेष ध्यान रखें और डायबिटीज के मरीज अपनी आंखों की नियमित जांच कराएं।

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