सरू, तू डूबी नहीं… तू तो पहाड़ की मिट्टी और पानी की रूह बन गई
पहाड़ की वादियों में जब चैत की हवाएं चलती हैं, तो वे अपने साथ केवल बुरांश की खुशबू नहीं, बल्कि सदियों पुरानी एक सिसकी भी लाती हैं। यह सिसकी ‘सरू’ की है। सरू—एक नाम जो कभी चंचलता का पर्याय था, आज एक मर्मस्पर्शी लोकगाथा का अमिट अध्याय बन चुका है।
वह स्वप्निल हठ: “हे बाबा, मैं क्वीली जाँदू”
कल्पना कीजिए उस दृश्य की, जहाँ अनुभव और आकांक्षा के बीच एक मूक युद्ध छिड़ा है। एक पिता, जिसकी आँखों में भविष्य की आशंकाएँ हैं, अपनी बेटी को रोकना चाहता है। वह जानता है कि क्वीली गढ़ के ‘सजवाण’ शासकों का वैभव जितना चमकीला है, उनका अनुशासन उतना ही पथरीला है। पिता के पास जीवन का ‘सार’ था, पर सरू के पास केवल उसका ‘मन’ था।
“मन त ल्हेगी धाँ मेरू त क्वीली, हे बाबा, मैं क्वीलि जाँदू…”
सरू का यह कहना कि उसका मन क्वीली ले गई है, महज एक जिद नहीं थी। यह एक स्त्री की अपनी नियति स्वयं चुनने की पहली और आखिरी छटपटाहट थी। उसे लगा था कि जहाँ सत्ता का शिखर है, वहाँ दुखों की परछाईं नहीं होगी। पर वह अबोध यह भूल गई कि सामंती अहंकार के महलों में ‘प्रेम’ अक्सर दम तोड़ देता है।
सुनहरी बेड़ियाँ और मोहभंग की दहलीज
ब्याह कर जब वह क्वीली पहुँची, तो वहाँ का वैभव उसे ‘काटने’ को दौड़ने लगा। सजवाणों के कठोर शासन ने अनुशासन के नाम पर सरू के पंख कतर दिए। जिन हाथों ने कभी आज़ादी से पहाड़ की चोटियों को छुआ था, अब वे ‘काटे-काटी कोदु’ (कठोर श्रम) और ‘अंध्यारी दोगी’ (अंधेरी कोठरियों) के गुलाम हो चुके थे। उसकी आँखें अब क्वीली के नक्काशीदार पत्थरों को नहीं, बल्कि मायके की उन खुली वादियों को ढूँढती थीं, जिन्हें वह अपनी जिद की भेंट चढ़ा आई थी।
अंतिम श्रृंगार: मृत्यु का उत्सव
सरू के अंत का सबसे मार्मिक हिस्सा उसकी ‘सजगता’ है। वह अपनी मृत्यु की ओर किसी पराजित की तरह नहीं, बल्कि एक वीरांगना की तरह बढ़ी।
उसने ‘दाबड्यों का गैणा’ (स्वर्ण आभूषण) पहने।
उसने अपना सर्वश्रेष्ठ रूप संवारा।
लोकगीत की पंक्तियाँ जब कहती हैं— “मैन त बोली थौलु जाँदी” (हमें लगा वह मेले जा रही है), तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उसने अपने महाप्रयाण को इतने सुंदर आवरण में लपेटा कि किसी को भनक तक न लगी। वह सज-धज कर अपनी ही ‘जल-समाधि’ के उत्सव की ओर निकल पड़ी।
“सरू तू मेरी ताल डूबी”— एक शाश्वत विलाप
जब वह क्वीली गढ़ के पार्श्व में बहती ‘गाड’ के गहरे तालाब में समाई, तो वह केवल एक शरीर नहीं था जो डूबा था; उसके साथ डूबी थी एक पिता की उम्मीद और एक समाज की संवेदना।
“जसी त टीपी, टीपी सल, तोंबा की गगर… सरू तू मेरी ताल डूबी।”
गगरी लेकर पानी भरने के बहाने जाना और फिर कभी वापस न आना—यह दृश्य आज भी पहाड़ की हर आँख में पानी भर देता है। ‘ताल डूबना’ केवल डूबना नहीं, बल्कि एक समूची परंपरा का निशब्द हो जाना था।
लोक-स्मृति की विरासत
सरू आज भी हमारे बीच जीवित है। वह हर उस बेटी के रूप में है जो अपनी पसंद का जीवन चुनना चाहती है, और वह हर उस स्त्री के रूप में भी है जो ‘सजवाणों’ जैसे कठोर पितृसत्तात्मक बोझ तले अपना अस्तित्व खो देती है। सरू का डूबना एक ‘मौन विद्रोह’ था। उसने घुट-घुट कर जीने के बजाय, अपनी गरिमा के साथ जल की शीतलता को चुनना बेहतर समझा।
आज भी जब क्वीली के उस तालाब की लहरें किनारों से टकराती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे सरू के पायल की छनक सुनाई दे रही हो। नरेंद्र सिंह नेगी के सुरों ने सरू को गीतों में अमर किया, तो क्वीली पट्टी के ही दिवंगत महान पत्रकार कुंवर प्रसून ने ‘युगवाणी’ में नवंबर 2001 में उसकी गाथा लिखकर उसे साहित्य में जीवित रखा। प्रसिद्ध निर्देशक अनिल बिष्ट ने इस गीत का इतना बेहतरीन फिल्मांकन किया है कि इतिहास जीवंत हो उठा है।
.सरू, तू डूबी नहीं… तू तो गढ़वाल की मिट्टी और पानी की रूह बन गई।”
सरू मरी नहीं है; वह तो चैत के गीतों में, ढोल की थाप में और गढ़वाल की मिट्टी की रूह में रच-बस गई है। यह गाथा हमें सिखाती है कि संवाद की कमी और समाज की कठोरता कभी-कभी इतने गहरे घाव दे जाती है, जिन्हें भरने के लिए सदियाँ भी कम पड़ जाती हैं।
संलग्न वीडियो में लेखक व्यक्तिगत रूप से याशिका राणा को नहीं जानते, पर इंटरनेट पर उनके इस मार्मिक अभिनय को देखकर निशब्द रह गए। आश्चर्य होता है कि आज भी कुछ समर्पित लोग अपनी मिट्टी की लोककथाओं और विरासत को इतनी संजीदगी से सहेजे हुए हैं। इन सबके साझा प्रयासों ने ‘सरू’ को केवल एक कहानी नहीं, बल्कि गढ़वाल की अटूट स्मृति बना दिया है।





