कोटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में व्यापारियों के लिए कम तौलने की अनेक विधियां बतलायी है लेकिन खाद्य उत्पादों में मिलावट की बात कहीं भी नहीं की है क्योंकि कम तौलने से मानव स्वास्थ्य को कोई खतरा नहीं है जबकि मिलावट के कारण जान भी जा सकती है। आजकल बड़े खतरनाक ढंग से खाद्य उत्पादों में मिलावट की खबरें आ रही है। दूध में पानी मिलाने की घटनाएं तो आम तथा अपेक्षाकृत कम नुकसानदेय है परन्तु आजकल तो दूध में डिटरजेंट, यूरिया, कास्टिक सोडा या तेल जैसी हानिकारक पदार्थों की मिलावट हो रही है जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत ही खतरनाक है। ठीक इसी तरह देशी घी में वनस्पति भी की मिलावट, लाल मिर्च में ईंट क चूरा या लकड़ी का बुरादा, हल्दी में मेटानिक येलो कलर, चाय की पत्ती में लोहे के कण, मिठाई या मावे में मैदे की मिलावट, सरसो के तेल में आर्जीमोन या पॉम ऑयल की मिलावट आज आम बात हो गई है। खाद्य उत्पादों में होने वाली इसी मिलावट को आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चढ्ढा ने संसद में उठाया है लेकिन सवाल यहां यह उठता है कि मिलावटखोरी के इस कृत्य के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है?

प्रोग्रेसिव डेरी फारमर्स एसोसिएशन उत्तराखंड के अध्यक्ष, सुबोध कुमार कहते हैं कि खाद्य उत्पादों में हो रही मिलावट के लिए कहीं न कही ग्राहक भी जिम्मेदार है। क्योंकि ग्राहक हमेशा रेट पर कम्प्रोमाईस कर लेता है जिसके कारण मिलावटी खाद्य उत्पादों के सामने असली खाद्य उत्पादों को टिकने में मुश्किलों का सामना करना पडता है। जैसे एक गाय से दूध उत्पादन के खर्च के हिसाब से आज के समय में दूध का रेट करीब 60 रू. लीटर होता है लेकिन मार्केट में आपको मिलावटी दूध 45 से 50 रू0 लीटर भी मिल जाता है। रेट में होने वाला यही अन्तर मिलावट होता है। ग्राहक को किसान के प्रति विश्वास पैदा करना होगा, उसे उसकी मेहनत का मूल्य अदा करके मजबूत बनाने का प्रयास करना होगा। सरकार चाहे कितना भी प्रयास कर ले जब तक ग्राहक जागरूक नहीं होगा तब तक मार्किट से मिलावट खत्म नहीं होगी।

फीमेल न्यूट्रिशन एक्सपर्ट एवं डायटीशियन वंदना का कहना है कि आजकल बाजार में सिर्फ मसालों में ही नहीं बल्कि भरोसे में भी मिलावट होने लगी है। ग्राहक जब बार-बार मिलावटी सामान की खबरें सुनता है तो शॉप पर जाते ही उसके दिमाग में एक छोटा सा “संदेह का अलार्म” बजने लगता है। वह पैकेट को ऐसे देखता है जैसे कोई जासूस सुराग ढूंढ रहा हो। कभी लेबल पढ़ता है कभी दुकानदार को घूरकर पूछता है-भाई साहब यह सच में शुद्ध है ना? इस माहौल में जो लोग सच में बिना मिलावट का सामान बेचते है उन्हें भी खुद को साबित करना पड़ता है। उन्हें अब सिर्फ सामान नाहीं बल्कि ईमानदारी और भरोसा भी पैक करके बेचना होता है। लेकिन एक मजेदार बात है-जहां ग्राहक को असली और शुद्ध चीज मिल जाती है वहीं वह पक्का ग्राहक बन जाता है क्योंकि आज के दौर में सबसे बड़ी मार्केटिंग यही है- “शुद्धता का स्वाद और भरोसे की खुशबू”
मिलावटखोरी का बढ़ता बाजार जिम्मेदार कौन?

प्रमुख आटा व्यवसायी मुणाल गोयल का कहना है कि मिलावटखोरी दरअसल पूरी तरह से व्यक्ति के माइंड से जुडा मसला होता है। जहां कुछ लोग अपने उसूलों से समझौता न करके ग्राहक को अच्छा सामान उपलब्ध कराते है तो वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी लोग होते है जो ज्यादा मुनाफे के लालच में ग्राहक के स्वास्थ्य से खिलवाड करने में भी नहीं चूकते। जब ग्राहक किसी सामान की पूरी कीमत देने को तैयार रहता है तब व्यवसायी की जिम्मेदारी होती है कि वे ग्राहक को अच्छी क्वालिटी का सामान हो उपलब्ध कराएं।

सिलक्यारा ब्रांड के फाउंडर लोकेश राज अस्थाना कहते है कि कम लागत ज्यादा मुनाफा ही वो सोच है जो मिलावटखोरी को बढ़ावा देती है। ग्राहक तो असली खाद्य उत्पादों की ही कीमत चुकाता है लेकिन जरा से मुनाफे के लालच के चलते कुछ लोग न केवल ग्राहक से उत्त्पादों की पूरी कीमत वसूल कर उन्हें घटिया किस्म के मिलावटी खाद्य उत्त्पाद बेच देते है बल्कि आम लोगों के स्वास्थ्य से भी खिलवाड कर रहे हैं। मिलावटखोरों के द्वारा किये जाने वाले इन कृत्यों का सीधा असर असली खाद्य उत्पादों का व्यापार करने वाले लोगों पर भी होता है। मिलावटखोरी के प्रति लोगों को खुद भी जागरूक होना पड़ेगा और देखना होगा कि अगर किसी उत्पाद की वास्तविक लागत हो 100 रु० है तो विक्रेता उसको 80 रू० में कैसे बेच रहा है? सरकार तो मिलावटखोरी की तरफ विशेष ध्यान दे ही साथ में लोग भी मिलावटखोरी के प्रति अपनी आवाज उठाएं तथा हमेशा अच्छी क्वालिटी के ही खाद्य उत्पाद उपयोग में लाएं।
मिलावटखोरों पर और कसेगा सरकार का शिकंजा
हर माह एक सप्ताह का विशेष अभियान चलेगा, स्टाफ की कमी भी होगी दूर
जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले मिलावटखोरों पर धामी सरकार का शिकंजा अब और कसेगा। त्योहारों के समय ही नहीं, बल्कि हर माह में एक सप्ताह खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांचने के लिए विशेष अभियान चलेगा। इसके अलावा, खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशाासन विभाग में स्टाफ की कमी को भी दूर किया जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को कतई बख्शा न जाए।
हर महीने अभियान, हाट-मेलों पर खास ध्यान
विधानसभा के बजट सत्र के चौथे दिन बृहस्पतिवार को सरकार ने साफ किया कि खाद्य पदार्थों की जांच का काम तेजी से चल रहा है। इसकी गति और तेज की जाएगी। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉ धन सिंह रावत ने कहा कि हाट-मेलों में बिकने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को खास तौर पर चेक किया जाएगा।
खाद्य पदार्थों की जांच-दो वर्ष का हिसाब
वर्ष 2023-24
-इस वर्ष में खाद्य पदार्थों के कुल 1627 नमूने लिए गए, जिसमें से 171 फेल हुए। इसके आधार पर 171 वाद पंजीकृत कराए गए।
वर्ष 2024-25
-इस वर्ष में खाद्य पदार्थों के 1684 नमूने लिए गए, जिसमें से 159 फेल हुए। इस आधार पर 159 वाद दायर किए गए।
दूर होगी खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की कमी
प्रदेश में वर्तमान में 28 खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की कमी है। इन पदों पर नियुक्ति के लिए सरकार ने लोक सेवा आयोग को अधियाचन भेजा है। सरकार का कहना है कि आयोग से भर्ती प्रक्रिया में यदि देर होती है, तो प्रतिनियुक्ति के जरिये भी इन पदों को भरने का प्रयास किया जाएगा। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री डाॅ धन सिंह रावत ने कहा कि खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के खाली पदों को जल्द से जल्द भरने के लिए सरकार प्रयासरत है। उन्होंने यह भी बताया कि देहरादून में टेस्टिंग लैब का कार्य 31 मार्च 2026 तक पूरा हो जाएगा।






