उत्तराखंड में वन विभाग के अफसर अचानक कैसे बन गए करोड़पति!

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उत्तराखंड में वन संपदा की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों के कंधों पर है, उन्हीं की अचानक बढ़ी दौलत को लेकर न्यायपालिका को भी हैरान कर दिया। राज्य में वन विभाग में कथित भ्रष्टाचार और वन भूमि से जुड़े गंभीर आरोप अब न्यायपालिका के सख्त रुख के दायरे में आ गए हैं। नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वन विभाग के अधिकारियों द्वारा कम समय में असामान्य रूप से संपत्ति अर्जित किए जाने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला केवल व्यक्तिगत संपत्ति का नहीं, बल्कि राज्य की वन संपदा के संरक्षण से सीधे जुड़ा हुआ है। अदालत के समक्ष यह तथ्य सामने आया है कि प्रदेश में 7,375 वन सीमा स्तंभों के गायब होने से वन भूमि की वास्तविक सीमाएं ही संदिग्ध हो गई हैं। यह मामला केवल व्यक्तिगत संपत्ति तक सीमित नहीं, बल्कि राज्य की वन भूमि, प्रशासनिक ईमानदारी और सार्वजनिक विश्वास से सीधे जुड़ा हुआ है। हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद वन विभाग की कार्यप्रणाली, अवैध कब्ज़ों, वन सीमा स्तंभों के गायब होने और संभावित भ्रष्टाचार की परतें खुलने लगी हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए याचिका में सीबीआई जांच की मांग उठाई गई है, जिस पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सर्वे ऑफ इंडिया, केंद्र सरकार और उत्तराखंड राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद वन विभाग की कार्यप्रणाली, संभावित भ्रष्टाचार और अवैध कब्जों को लेकर प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। शंभू नाथ गौतम, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तराखंड में वन विभाग की कार्यप्रणाली और कथित भ्रष्टाचार एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। जिन अधिकारियों पर जंगलों की सुरक्षा, वन भूमि के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी है, उन्हीं की अचानक बढ़ी संपत्ति और वन भूमि से जुड़े मामलों ने न्यायपालिका को चिंतित कर दिया है। नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वन विभाग के अफसरों द्वारा कम समय में असामान्य रूप से संपत्ति अर्जित किए जाने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे सामान्य प्रक्रिया से परे बताया है। अदालत ने साफ कहा है कि सीमित वेतन और तय सेवा शर्तों के बावजूद अधिकारियों का करोड़पति बन जाना गहन जांच की मांग करता है।यह याचिका पर्यावरण एक्टिविस्‍ट नरेश चौधरी ने दायर की थी। उन्होंने सर्वे ऑफ इंडिया से मसूरी फारेस्‍ट डिवीजन की सभी वन सीमाओं का वैज्ञानिक और जियो-रेफरेंस्ड सर्वे कराने की मांग की है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि राज्य में राजस्व अधिकारियों के पास मौजूद या उनके नियंत्रण वाले सभी वन भूमि को एक निश्चित समय सीमा के भीतर वन विभाग को सौंप दिया जाए। वन सीमाओं को बहाल न करने से व्यावसायिक शोषण को बढ़ावा मिला है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष हुई। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला केवल व्यक्तिगत संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव राज्य की वन संपदा, प्रशासनिक पारदर्शिता और जनता के विश्वास से जुड़े हुए हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि समय रहते इन मामलों पर कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो उत्तराखंड की बहुमूल्य वन भूमि को भारी नुकसान हो सकता है। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि राज्य के विभिन्न वन क्षेत्रों में 7,375 वन सीमा स्तंभ (बाउंड्री पिलर) गायब पाए गए हैं। अदालत ने इसे अत्यंत गंभीर मामला बताते हुए कहा कि सीमा स्तंभों का इस तरह लापता होना किसी एक-दो घटनाओं का परिणाम नहीं हो सकता। पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि सीमा स्तंभों का हटना या गायब होना वन भूमि पर अवैध कब्जे और गैरकानूनी निर्माण का रास्ता खोलता है, जिससे जंगलों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। याचिका में आरोप लगाया गया कि वन सीमा स्तंभों के गायब होने से वन भूमि को निजी भूमि के रूप में दर्शाकर उस पर होटल, रिसॉर्ट और अन्य व्यावसायिक निर्माण किए गए। अदालत को बताया गया कि कई मामलों में यह सब कुछ विभागीय मिलीभगत के बिना संभव नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए कहा कि यदि आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाते हैं, तो यह पूरे वन प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई जांच की मांग को भी रिकॉर्ड पर लिया है। अदालत ने संकेत दिए कि यदि राज्य स्तर की जांच संतोषजनक नहीं पाई जाती, तो स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से जांच कराए जाने पर विचार किया जा सकता है। पीठ ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है। हाईकोर्ट ने इस पूरे प्रकरण में सर्वे ऑफ इंडिया, केंद्र सरकार और उत्तराखंड राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। हाईकोर्ट ने जानना चाहा है कि वन सीमा स्तंभों के रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी किस विभाग की थी, उन्हें कब और किन परिस्थितियों में स्थापित किया गया था और उनके गायब होने के बाद क्या कार्रवाई की गई। इसके साथ ही अधिकारियों की संपत्ति के स्रोतों और उनके सेवा रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी भी मांगी गई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि सीमा स्तंभ प्राकृतिक आपदाओं, भूस्खलन या अन्य कारणों से नष्ट हुए हैं, तो उसका विधिवत रिकॉर्ड और पुनर्स्थापन की प्रक्रिया होनी चाहिए थी। बिना किसी ठोस दस्तावेज के यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि वन भूमि से जुड़े मामलों में लापरवाही को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में वन केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि जीवन, जल और आजीविका का आधार हैं। यदि वन विभाग के भीतर ही भ्रष्टाचार पनपता है, तो इसका सीधा असर आम जनता और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। अदालत ने कहा कि शासन और प्रशासन का दायित्व है कि वे वन संपदा की रक्षा के लिए कठोर और पारदर्शी कदम उठाएं। मामले में यह पहलू भी सामने आया कि जिन क्षेत्रों में वन सीमा स्तंभ गायब हुए हैं, वहां अवैध कब्जों की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। कई स्थानों पर वन भूमि पर निर्माण कार्यों को नजरअंदाज किया गया या जानबूझकर अनदेखा किया गया। हाईकोर्ट ने इस स्थिति को चिंताजनक बताते हुए कहा कि इससे यह संकेत मिलता है कि नियमों का पालन कागजों तक सीमित रह गया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वन विभाग का दायित्व केवल फाइलों में रिपोर्ट तैयार करना नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी निगरानी और कार्रवाई सुनिश्चित करना है। जब विभाग के अधिकारी ही सवालों के घेरे में आ जाते हैं, तो पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर आंच आती है। इसी कारण अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए सभी संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति मनोज तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की पीठ की सख्त टिप्पणियां इस बात का संकेत हैं कि अदालत इस मामले को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। यदि जांच आगे बढ़ती है, तो यह उत्तराखंड के वन विभाग में लंबे समय से लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की परतें खोल सकती है। कोर्ट की सख्ती के बाद राज्य के प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार, वन विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियां अदालत के समक्ष क्या जवाब दाखिल करती हैं और क्या सीबीआई जांच की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि नैनीताल हाईकोर्ट के कड़े तेवर ने उत्तराखंड में वन विभाग से जुड़े कथित भ्रष्टाचार को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है और आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा- जंगलों में आग को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए

उत्तराखंड में लगातार बढ़ रही जंगलों में आग की घटनाओं को लेकर नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने राज्य में वनाग्नि की स्थिति पर कड़ा रुख अपनाते हुए इसे पर्यावरण, जनजीवन और वन संपदा के लिए बड़ा खतरा बताया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि हर साल गर्मियों के मौसम में जंगलों में आग लगने की घटनाएं सामने आती हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रभावी रोकथाम और नियंत्रण के इंतजाम जमीन पर नजर नहीं आते। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि जंगलों में आग को रोकने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं और पूर्व में जारी दिशा-निर्देशों का कितना पालन किया गया है। अदालत ने इस पूरे मामले में राज्य में वनाग्नि पर विस्तृत रिपोर्ट तलब करते हुए कहा कि केवल आंकड़े पेश करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी बताना होगा कि आग की घटनाओं को कम करने के लिए विभागीय स्तर पर क्या रणनीति अपनाई गई है। हाईकोर्ट ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक और फॉरेस्ट फोर्स को विशेष रूप से निर्देश दिए हैं कि वे जंगलों में आग की रोकथाम, त्वरित नियंत्रण और नुकसान के आकलन को लेकर स्पष्ट कार्ययोजना अदालत के समक्ष रखें। कोर्ट ने कहा कि वनाग्नि केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि कई बार मानवीय लापरवाही और जानबूझकर की गई गतिविधियों का परिणाम भी होती है, ऐसे में जिम्मेदारी तय करना बेहद जरूरी है। अदालत ने यह भी कहा कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि जल स्रोतों, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका का आधार हैं। जंगलों में आग लगने से न केवल हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो जाता है, बल्कि वन्यजीवों, ग्रामीण आबादी और पर्यावरण संतुलन पर भी गहरा असर पड़ता है। इसके बावजूद यदि हर वर्ष हालात एक जैसे बने रहें, तो यह प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है। हाईकोर्ट ने पूर्व में वनाग्नि को लेकर जारी किए गए निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि कागजों में बनी योजनाएं तब तक सार्थक नहीं हैं, जब तक उनका प्रभावी क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर न हो। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि आग लगने की घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया के लिए फॉरेस्ट फोर्स कितनी तैयार है और क्या आवश्यक संसाधन, उपकरण और मानव बल उपलब्ध कराए गए हैं। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि कई मामलों में समय पर सूचना न मिलने और समन्वय की कमी के कारण आग बेकाबू हो जाती है। हाईकोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि तकनीक के इस दौर में ऐसी लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने निर्देश दिए कि निगरानी व्यवस्था, फायर अलर्ट सिस्टम और स्थानीय स्तर पर सहभागिता को मजबूत किया जाए। कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वनाग्नि से हुए नुकसान का आंकलन कर उसके आधार पर भविष्य की कार्ययोजना तैयार की जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो और जिम्मेदारी तय की जाए। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब निगाहें सरकार और वन विभाग की रिपोर्ट पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि अदालत के इस रुख के बाद उत्तराखंड में जंगलों में आग की समस्या से निपटने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने का दबाव बढ़ गया है।

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